پیر، 26 فروری، 2024

कीलन मंतर

मण्डल,मनुष्य का संबंध,चरित्र,विचार,भावनाये सब कुछ तो तंत्र से ही चल रहा है;जिसे हम जीवन तंत्र कहेते है॰जीवन मे कोई घटना आपको सूचना देकर नहीं आता है,क्योके सामान्य व्यक्ति मे इतना अधिक सामर्थ्य नहीं होता है के वह काल के गति को पहेचान सके,भविष्य का उसको ज्ञान हो,समय चक्र उसके अधीन हो ये बाते संभव ही नहीं,इसलिये हमे तंत्र की शक्ति को समजना आवश्यक है यही इस ब्लॉग का उद्देश्य ह
सर्व-्रसिद्धी.(एवं तंत्र बाधा निवारण साधना).
किसी भी शाबर मंत्र को सिद्ध करने के लिये एक विधी-विधान दे रहा हू और साथ मे तंत्र बाधा निवारण का मंत्र दे रहा हू.प्रत्येक शाबर मंत्र के जाप से पूर्व निम्न प्रकार का विधी करे तो अवश्य ही सफलता मिलने हेतु विधी से मदत मिलता है.यह विधी करने से नवनाथ भगवान का विशेष कृपा प्राप्त होता है और मंत्र सिद्ध हो जाते है.

सर्वार्थ साधक मंत्र गुरू मंत्र के तराहा ही कल्पवृक्ष है जो किसी भी शाबर मंत्र मे सफलता देने हेतु साहाय्यक माना जाता है.

सर्वार्थ साधक मंत्र की 21 बार जप करे,

मंत्र-

|| गुरु सठ गुरु सठ गुरु है वीर, गुरु साहब सुमरौ बड़ी भांत,सिङ्गि टोरों बन कहौं,मन नाऊ करतार सकल गुरु की हर भजे, घट्टा पाकर उठ जाग चेत सम्भार श्री परम हंस ||

इस के बाद देह रक्षा की मंत्र 11बार पढे ताकी आपको किसी भी शत्की से कोई हानी ना हो.

देह रक्षा मंत्र-

||जीवन मरण है तेरो हात ,भैरो वीर तू हो
जा मेरे साथ,रखियो वीर तुम भक्त की लाज , बिगाड़ न पावे कोई मेरो काज,दुहाई लूना चमारिन की दुहाई कामख्या माई की दुहाई गौरा पार्वती की चौरासी सिद्धो को आदेश आदेश आदेश ||

इस के बाद आसन किलन मंत्र का जाप 11 बार करे और आसन का पुजन करे.

आसन किलन मंत्र-

||धरती किलूं पाताल किलूं , किलूं सातो आसमान , चौरासी सिद्धों के आदेश से आसन किलूं ना हो अपमान,लूना चमारिन की आन है गुरु गोरख की यह शान है||

इस के बाद एक लोहे का किल लेकर
अपने चारो और गोल घेर बना ले जिससे आपका सुरक्षा होगा.

घेर मंत्र-

||जो घेड़ा तोड़ घर मह घुसे ;रक्त काली उसका रक्त चुसे,दुहाई माँ कामख्या की,दुहाई माँ कामख्या की,दुहाई माँ कामख्या की||

इस के बाद दशो दिशाओं को बांध दे ताकी साधना मे कोई बाधा उत्पन्न ना हो और इसके लिये मंत्र बोलते हुए अष्टगंध से मिश्रित चावल को दसो दिशा मे एक-एक बार मंत्र बोलते हुए छीडकना है.

दिशा बांधने का मंत्र-

||ॐ वज्र क्रोधाय महा दन्ताय दश दिशों बंध बंध हुं फट स्वाहा||

अब एक आसन बिछा के उसके उपर एक बाजोट रखे और बाजोट के ऊपर एक थाली की ऊपर नौ पान की पत्ते और पत्ते की उपर नौ दीपक,बिच में एक गोल पात्र जिसमे धुनी जलाया जा सके ठीक वैसा ही करना है. पान के पत्ते पे एक एक सुपारी लौंग, इलाइची,पतासे और एक रूपया का सिक्का रखे दे,दीपक में घी या मीठा तेल डाल कर धूप बत्ती लगा के रखे बीच में धुनी जलादे और धुनी जलाते वक्त यह मंत्र पढे.

धुनी मंत्र-

|| धुनी धरे-धुआं करे,,तोह नव नाथ पधारे जो नाथ ना पधारे तोह शिव की जटा टूट भूमि में पड़े अदेश आदेश नव नाथों को आदेश ||

अब नौ दीपक को एक एक श्लोक पढ़ते हुए एक एक कर जलाये-

श्लोक 1.
आदिनाथ आकाश सम,सूक्ष्म रूप ॐकार तिन लोक में हो रहा,अपनी जय जय कार.

श्लोक 2.
उदय नाथ तुम पार्वती,प्राण नाथ भी आप धरती रूप सु जानिए मिटे त्रिबिध भव ताप

श्लोक 3.
सत्य नाथ है सृष्टि पति,जिनका है जल रूप,नमन करत है आपको स चराचर के भूप.

श्लोक 4.
विष्णु तो संतोष नाथ खांड़ा खड़ग स्वरूप राज सम दिव्य तेज है तिन लोक का भूप.

श्लोक 5 .
शेष रूप है आपका ,अचल अचम्भे नाथ आदि नाथ के आप प्रिय सदा रहे उन साथ

श्लोक 6.
गज-वली गज के रूप है .गण पति कन्थभ नाथ,देवो में है अग्र तम सब ही जोड़े हाथ

श्लोक 7.
ज्ञान पारखी सिद्ध है ,चन्द्र चौरंगी नाथ,जिनका वन-पति रूप है उन्हें नामाऊ माथ.

श्लोक 8.
माया रूपी आप है,दादा मछ्न्द्र नाथ,रखूं चरण में आपके ,करो कृपा मम माथ.

श्लोक 9.
शिव गोरक्ष शिव रूप है,घट-घट जिनका वास ,ज्योति रूप में आपने किया योग प्रकाश.

अब आप धुनी और दीपकों को जला चुके
है.अब् नव नाथ स्वरुप का ध्यान करके आशीर्वाद प्राप्त करे.

नवनाथ ध्यान मंत्र-

|| अदि नाथ सदा शिव है जिनका आकाश रूप,उदय नाथ पार्वती पृथ्वी रूप जानिए,सत्य नाथ ब्रह्मा जी जल रूप जानिए,विष्णु संतोष नाथ तिनका रूप मानिये,अचल है अचम्भे नाथ जिनका है शेष रूप,गजवली क्न्थभ नाथ हस्ती रूप मानिये,ज्ञान पारखी जो सिद्ध है वोह चौरंगी नाथ,अठार भर वनस्पति चन्द्र रूप जानिए,दादा गुरु श्री मछन्द्र नाथ जिनका है माया रूप,गुरु श्री गोरक्ष नाथ ज्योति रूप जानिए,बाल है त्रिलोक नव-नाथ को नमन करूँ,नाथ जी ये बाल को अपना ही जानिए ||

अब एक अद्वितीय तंत्र,मंत्र,यंत्र,जन्त्र,बंधन दोष एवं सर्व बाधा निवारण मंत्र दे रहा हु-

अभिचार-कर्म नाशक मंत्र-

ll राम नाम लेकर हनुमान चले,कहा चले चौकी बिठाने चले,चौकी बिठाके रात की विद्या दिन की विद्या चारो प्रहर की विद्या काटे हनुमान जती,मंत्र बाँध तंत्र बाँध जन्त्र बाँध रगड के बाँध,मेरी आण मेरे गुरू की आण,छु वाचापुरी ll

मंत्र का रोज मंगलवार से 108 बार जाप 21 दिन करना है.शाबर मंत्रो मे बाकी नियम नही होते है.मंत्र सिद्ध होगा & बभुत पर मंत्र को 11 बार पढकर 3 फुंक लगाये.अब बभुत को जिसपर तंत्र बाधा हो उसके माथे पर लगा दे तो पीडित के कष्ट दुर हो जायेगा.इस मंत्र से चौकी भी लगता है,बाधा भी कटता है और बंधन भी लगाया जाता है.यह हनुमत मंत्र मुझे गुरूमुख से प्राप्त हुआ है जो इस दुनिया के किसी भी किताब मे नही है.इस मंत्र से झाडा भी लगा सकते है

आदेश।।

काल भैरव मन्त्र

काल भैरव मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी काला काला काला खप्परें मूढ़े वाला।ब्रम्हबली काल भैरव जति सती।कालें कुकर की सवारी।मैं काल भैरव का वीर पुजारी।लख लख कोट लख लख खाई।चल काल भैरव की चील चबाती जलें बलें आईं।कहे लोना चमारिन बधे तिल न घटे राई।काल भैरव की दुहाई।काल भैरव की दुहाई।काल भैरव की दुहाई।गुरु गोरक्षनाथ जी की माईं।चलें काल भैरव नारी रूपा।चलें काल भैरव पुरुष रूपा।चलें काल भैरव बालक रुपा।ॐ काल कंकाल महाकालाय विदमहे काल पुरुषाय धीमहि तन्नो काशी कोतवाल काल भैरवाय प्रचोदयात।इतना काल भैरव मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

काल भैरव वीर सिद्धि का मन्त्र

काल भैरव वीर सिद्धि का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी चेत सुना सान।औंधी खोपड़ी मरघटिया मसान।बाँध दे रामदूत हनुमान।काल भैरव खड़ा बीच मढ़ी मसान।कानों कुण्डल हाथ त्रिशुल कपाल।बंम बंम काल भैरव नाथ।जहाँ सुमरुँ काल भैरव वहाँ त्यार।इतना काल भैरव मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ गुरु गोरक्षनाथ जी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

मुहम्मद पीर का मन्त्र

मुहम्मद पीर का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी विस्मिल्लाह अर रहमान निर रहीम।लाइल्लाह इललिल्लाह।मुहम्मद रसुलिल्लाह।गढ़ गजनी से चलें मुहम्मद पीर।मुहम्मद पीर हुँकारता चलें।मुहम्मद पीर गाजता चलें।मुहम्मद पीर घोरता चलें।चल रें चल मुहम्मद पीर चल।सवा सेर का तोसा खाये।अस्सी कोस का धावा लगाय।श्वेत घोड़ा श्वेत पलान।जिस पर चढ़े मुहम्मद पीर सैय्यद पठान।माथे टोपी पाँव रेशमी जूती हाथ तलवार।चल रे चल गढ़ गजनी के मुहम्मद पीर।तेरे समान नहीं कोई वीर।परी जिन्नात को लावैं।चोर चुड़ैल पिशाच को लावें।भूत प्रेत शैतान को लावैं।डंकिनी शंकिनी लंकिनी को लावैं।काँचा कलुआ जिन्द खईस वैताल को लावैं।सात समुद्रों की खाई से लावैं।ब्रम्हा जी के वेदों से लावैं।काजी की कुरआन से लावैं।मुल्ला की बांग लावैं।मक्का मदीना के काबे से लावैं।मन्दिर मठ के तख्त से लावैं।जाओ जाओ जहाँ हो तहाँ से लावैं।गढ़ से किला से कोट से पर्वत से लावैं।गली मुहल्ला चौराहे से लावैं।खेत खलिहान कुढ़े से लावैं।बाग बग़ीचा बाड़ी से लावैं।बारह आभूषण सोलह श्रृंगार से लावैं।हाट बाजार चोकटी से लावैं।कुआ बावड़ी तालाब पोखर से लावैं।मढ़ी मसान चौपटा से लावैं।जलती चिता मुआ मुर्दा कफ़न कब्रिस्तान कब्र दरगाह से लावैं।खाट से पाया से डण्डे से मुज के बाण से लावैं।नवनाड़ी बहत्तर कोठा की घूमती बलाय को लावैं।हाजिर करें।हाड़ हाड़ से।चाम चाम से।नख सिख से।रोम रोम से।घट पिण्ड से लावैं रे।ताईयां सिलार जिन्द पीर मारतो पीटतो तोड़तो पछाड़तो।हाथ हथकड़ी पाँव में बेड़ी।गले में तोक उलटा कब्जा चढ़ाय।मुख बुलाय।सीस खिलाय।शब्द साँचा पिण्ड काँचा।फुरों मन्त्र गुरु गोरक्षनाथ वाचा।सत्यनाम आदेश गुरु का।

विष निवारण मन्त्र

विष निवारण मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी की आदेश।ॐ गुरुजी काला साँप पीला बिच्छू।गोहिरा नेवला खड़खड़ाया।महादेव जी कोरा घड़ा अमृत से ला भरा।हनुमान जी ने माता गौरां पार्वती देवी के आगे ला धरा।गौरां पार्वती देवी मल मल नाहवन लागी।काला साँप पीला बिच्छू गोहिरा नेवला का ज़हर पाताल की मनसा देवी पीवन लागी।गुरु गोरक्षनाथ जी की दुहाई।माया मछिन्द्रनाथ जी की दुहाई।शब्द साँचा पिण्ड काँचा।फुरों मन्त्र ईश्वरों वाचा।सत्यनाम आदेश गुरु का।

देवी लंकेश्वरी सिद्धी

देवी लंकेश्वरी सिद्धी

श्री लंकेश्वरी देवी

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी आदि देवी युगादि देवी।लंकापुरी की लंकेश्वरी देवी।किया हमारा कीजिये।नवखण्ड पृथ्वी में पहरा दीजिये।लंकेश्वरी देवी तूं आदिशक्ति।आसन बाँधो मढ़ी मसाण बैठी।हाड़ की कोठी चाम की मढ़ी।जहाँ सुमरूँ वहाँ लंकेश्वरी देवी हाजिर हजूर खड़ी।दक्षिण दिशा से लंकेश्वरी देवी आई।हाथ कंगन कानों कुण्डल माथें बिंदियां पगा नेवर। सिर काली जटा गले काला नाग मुण्डमाला हाथ त्रिशुल खप्पर।सिर के केश बखेरती आई।बैरी दुश्मन को पटकती आई।देव दानव राक्षस को पछाड़ती आई।पापी पाखण्डी चोर को पकड़ती आई।कच्चा पक्का मढ़ी मसाण खाती आई।भींत के भड़भेटा देती आई।सार का चना चबाती आई।लोहे का टुकड़ा करती आई। तार तार माता लंकेश्वरी देवी तार।कभी न खायें इस जीव को काल।लंकेश्वरी देवी हो प्रचण्ड।मावस ऊपर पड़वा ढ़ले।राजा गोपीचन्द राजा भृतहरि तेरा ध्यान धरें।गौरी नन्द गणेश जगा काली पुत्र काल भैरव को जगाऊँ और जगाऊँ अंजनी सुत हनुमान।गुरु गोरक्ष नाथ के चरणों में शीश नवा आदिशक्ति लंकेश्वरी देवी को जगाऊँ औऱ मैं सेवूं चौपटा मढ़ी मसान।चार कोस के भूत प्रेत जिन्द कसाई बाँधूं बाँधे ज़मीन आसमान।आठ कोस की डंकिनी शंकिनी चुड़ैल बाँधूं बाँधे मुहम्मद अली रहमान।लंकेश्वरी देवी को कौंन ध्याया।लंकापुरी के राजा दशानन रावण औऱ कुम्भकर्ण मेंघनाद ध्याया।लंकेश्वरी देवी आई।हाथ खड़्ग खप्पर अघोर जंजीर लाई।गाजती आई।किलकिलाती आई।मढ़ी मसाण में मुर्दे फाड़ती आई।साथ में ऋद्धि बुद्धि का स्वामी गणेश जी औऱ अंजनी सुत हनुमान जी आया।संग में काली पुत्र काल भैरव आया।सवामण का खड़्ग औऱ मसानी जंजीर लाया।सतवंती मंदोदरी देवी औऱ सुलोचना आई।बाँध बाँध पैरों में बेड़ी।हाथों में हथकड़ी बाँध।गलें में जंजीर आंखों पे पट्टी डाल।काँचा बाँध कलुआ बाँध मूठ बाँध मुठ्यारा बाँध चौकी बाँध आसन बाँध पितृ बाँध यक्ष बाँध गन्धर्व बाँध किन्नर बाँध मैली बाँध कुचैली बाँध परी बाँध जिन्नात बाँध।भागे को पकड़ लाये।रूठे को मनाया लाये।गढ़े धन को दिखाय दे।चोर को बताय दे।रणभूमि में शत्रु को गिराय दे।इतना काम लंकेश्वरी देवी हमारे गुरु हमारा का करें।जागो लंकेश्वरी देवी माई।उठो लंकेश्वरी देवी माई।नहीं जागो तो महादेव जी की करोड़ करोड़ दुहाई।नहीं उठो तो माता गौरां पार्वती देवी की लाख लाख दुहाई।वाचा छोड़ कुवाचा करें।तो कपूरी धोबिन की नाँद लोना चमारि के कुंडे में पड़े।हमारा इतना काम नहीं करें।तो राजा रामचन्द्र लक्ष्मण जति सती सीता माई की कोटि कोटि दुहाई फिरें।शब्द साँचा पिण्ड काँचा फुरों मंत्र ईश्वरो वाचा।सत्यनाम आदेश गुरु का।

अवधुत गायञी

अवधुत गायञी

अवधूत गायत्री मंत्र :- यह गायत्री मंत्र अघोर क्रिया का हैं अतः कोई भी सज्जन बिना सतगुरु मार्गदर्शन में नहीं करें।

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी अवधूत अवधूत भाई भाई।अवधूत खोजों घट के मांही।एक अवधूत का सकल पसारा।एक अवधूत सभी से न्यारा।उस अवधूत की संगत करना।जिस संगति से पार उतरना।उत्तराखण्ड से योगी आया।ऊँचे चढ़ के नाद बजाया।नाद बजा के ब्रम्ह जगाया।ऐसा योगी कभी नहीं आया।शैली सिंगी बटुआ लाया।बटुवें में काली नागिन।काली नागिन किसकी चेली।गगन मण्डल में फिरें अकेली।काली नागिन को मार कर तलें बिछालो मेरें भाई।तब न होगी आवा जाई।हम बिगड़े सो बिगड़े भाई।तुम बिगड़े सो राम दुहाई।हमारे सतगुरु तो बहुरंगी।सबके संगी।सबका भेद बतायेंगे।अनघड़ के चेले रहे अकेलें।जति सती को शीश नवायेंगे।इस विधि दुनिया को योगी कहलायेंगे।पात्र फोड़ पवित्र कर लूं हाकिम का मुँह काला कर दूं।राजा कर दूं भैसा।मढ़ी कब्रिस्तान दला डूंगरा।रुख वृक्ष की छायां।सुन रे हँसा कहाँ से आया।तीन लोक चौदह भुवन सप्त पाताल से आया।सब कुल की लज्जा मिटा।सब घर भिक्षा लेनें जा।कोढ़ी कपटी से कैसे जीते।कैसे हारें।हिंदु तुर्क एक ही जानें।चलती पवन रोक दूँ।धरती उलट दुं।आसमान पलट दुं।रोड़िया खोड़ीया टुंडीया हाथी नोबत कर दूं।उलटी ख़ाक।रस्ता सुरसरी मुरसरी।योगेश्वर बढ़े योग के ध्यान।कौंन चेला लोभी लालची।आडलो कपड़ा दूध का दूध।पानी का पानी।सिद्ध का मार्ग साधक कर जानी।इतना अवधूत गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।गंगा गोदावरी त्र्यम्बकं क्षेत्र कोलागढ़ पर्वत की अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ श्री सदाशिव शम्भुजति गुरु गोरक्षनाथ जी ने नवनाथ चौरासी सिद्ध अनन्त कोटि सिद्धों को पढ़ कथ कर सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

धुनी गायञी मंञ

धुनी गायञी मंञ

धूणी गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी प्रथमें सुमरुं श्री बाल योगी सदाशिव शम्भुजति गुरु गोरक्ष नाथ योगी।गुरु गोरक्ष नाथ के दोऊँ चेलें हाट नाथ वाट नाथ दग दग धरती।प्रचण्ड धूणी आग्नि का कोट पवन की खाई।अलख पुरुष की सेज विछाई।बाला योगी पोढ़ न आयें।ऊँचे चढ़ कर नाद बजायें।कानों कुण्डल सिर जटा।हाथ चिमटा त्रिशुल फावड़ी काँधे लता।नवनाथ चौरासी सिद्ध तैतीस कोटी देवी देवताओं ने मिलकर किया धूणी पाणी का मता।धूणी का पोट अग्नि का कोट।धुयें का गोला।तीनों पुरुष रक समान ।न जलें धरती न जलें आकाश।जहाँ धूणी गायत्री माई का भया प्रकाश।जीव जंतु कीड़ा मकोड़ा मोक्ष मुक्ति फल पाई।पांच कोस आगे से।पांच कोस पीछे से।पांच कोस दांयीनी भुजा से।पांच कोस बायींनी भुजा से।आठ कोस की माया चारों जुग की काया अस्सी कोस की ऋद्धि सिद्धि ला धूणी गायत्री माई।नहीं लावें तो गुरु गोरक्ष नाथ जी करोड़ करोड़ दुहाई।वेद पुराण का पाठ करन्ते ब्रम्हा जी धूप दीप ले आई गौरां पार्वती माई।विष्णु जी लाये समिधा लकड़ी।कुबेर भण्डारी लाये ऋद्धि सिद्धि।सब सिद्ध सन्तो को बोल बुलाई।ठौर ठौर आसन बिछायें।आसन बैठे बारह पँथ के बारह पीर।अलख जाप निर्भय जोगी।नवनाथ चौरासी सिद्धों के बीच ज्वाला आन समाई।अलख पुरुष ने धूणी चेताई।हुआ प्रकाश।चेतन भई धूणी।गुग्गल घृत धूणी पाणी अन्नपूर्णा देवी भोग लगाई।आओ सिद्धों चेतो सिद्धों पलटी विभुति धूणी चेताई।अयोनि शिव शंकर तेरी दुहाई।कौंन आसन जपूं जाप।कौंन आसन धरूँ ध्यान।कौंन आसन रहूँ शून्य में कौंन आसन कथूं ज्ञान।पूर्व आसन जपूं जाप उत्तर आसन धरूँ ध्यान।दक्षिण आसन रहूँ शुन्य में पश्चिम आसन कथूं ज्ञान।इतना धूणी गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।कैलाश पर्वत मानसरोवर झील पर सिद्धासन बैठ महादेव जी ने अवधूत दत्तात्रेय नाथ जी को कान में सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

ञिकाल संजीवनी मंञ

ञिकाल संजीवनी मंञ

त्रिकाल संजीवन गायत्री मंत्र :-इस गायत्री मंत्र का प्रभाव बहुत प्रभावी और अत्यंत लाभ प्रद हैं तथा यह सौम्य मन्त्र हैं इस मन्त्र का जप कोई भी कर सकता हैं नर नारी दोनों भी कर सकते है

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ओउम सोहंम अमर योगी अमर काया।अमर लोक से उतरी माया।ब्रम्हा विष्णु महेश रचाया।हाड़ चाम की मढ़ी पवन अलील की काया।गलें नहीं हाड़ सड़े नहीं चाम स्थिर रहें योगी की काया।त्रिकाल संजीवन गायत्री मंत्र देवाधिदेव महादेव जी ने गौरां पार्वती को कान में सुनाया।कहे गुरु गोरक्ष नाथ जी सुनो नवनाथ चौरासी सिद्धों अमर किन्हीं गौरां पार्वती माई की काया।मरें नहीं गौरां पार्वती माई।आवें न जावें।कहाँ से उत्पन्नी गौरां पार्वती माई।कहाँ से उत्पन्नी सुरें।कण्ठ से उत्पन्नी गौरां पार्वती माई।शीश से उत्पन्नी सुरें।रूपवंती एक जन्म।सत्यवन्ती दो जन्म।शीलवंती तीन जन्म।चण्डी चार जन्म।पृथ्वी पांच जन्म।क्षमा छठे जन्म।सावित्री सात जन्म।नवदुर्गा नवें जन्म।गर्भवन्ती दसवें जन्म।मुले असल कहन्ती।मूलवन्ती देवी।माई पात्र कृष्ण वर्णी।ऋद्धि सिद्धि के भंडारे भरन्ती।काल कण्टक को भस्म करन्ती।देव दानवों को प्रताड़ित करन्ती।गो हत्या,जीव हत्या, स्त्री हत्या, ब्रम्ह हत्या, अन्न हत्या दोष हरन्ती।योगी के कुल से इकोत्तर सो पुरुषां ले अमरापुर तरन्ती।पिण्ड प्राण की रक्षा करन्ती।राख राख माता त्रिकाल संजीवन गायत्री राख।अघोर पिण्ड पड़न्ता राख।ब्रम्हा विष्णु महेश भरें सांख।तेरा दिया शिवपुरी में वास।इस प्राणी को अन्त काल में कभी न भक्षय काल अकाल।चार मुख द्वारा सुमिरण करें।चार प्रहर वेद न झरें।अम्बर मुख झरें।धरती मुख फलें।पान फूल गऊ मुख द्वारा चरें।मूल द्वारे गोबरी करें।भग द्वारें गंगा यमुना सरस्वती का नीर झरें।महादेव जी भर लाये कर्म कमण्डल विष्णु जी भर लाये जल।गौरां पार्वती माई चौका लगायें।गुरु गोरक्षनाथ जी घन चक्र पुरें।ब्रम्हा जी चार वेद का पाठ करें।सात जन्मों का पाप कटें।लख चौरासी जिया जून से फेरा टलें।अवधूत दत्तात्रेय नाथ जी त्रिकाल संजीवन गायत्री मंत्र का जाप जपन्ते।गौरी नन्द गणेश ऋद्धि सिद्धि का भण्डार भरें।काली पुत्र काल भैरव काल अकाल मृत्यु से निर्भय करें।अंजनी सुत हनुमान संकट हरे।प्रातः काल जपे अष्ट सिद्धि नवनिधि पावें।मध्यांहः काल जपे मोक्ष मुक्ति फल पावें।संध्याह्न काल जपे शिवपुरी में जावें।इतना त्रिकाल संजीवन गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।गंगा गोदावरी त्र्यम्बकं क्षेत्र कोलागढ़ पर्वत की अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ श्री सदाशिवः शम्भुजति गुरु गोरक्ष नाथ जी ने नवनाथ चौरासी सिद्ध बारह पँथ अनन्त कोटी सिद्धों को पढ़ कथ कर सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

महाकाली मंञ

महाकाली मंञ

महाकाली मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी बंगाल खण्ड कामरू देश में बंगाल की खाड़ी।जहाँ बैठी महाकाली।काली कंकाली महाकाली।जल की जोगिनी पाताल की नागिन।आगे चलें काल भैरव वीर।पीछें चलें हनुमन्त वीर।दांये चलें गणेश वीर।बायें चलें बावन वीर।काली पंचमुखी गुड़ गुड़ आवें।दप दप बाँधे।पाश पाश छुटे। वीर लुटे।लोटन वीर की दुहाई।वीर की जटा हिलें।माई की चाल रुकें।रक्त वीर की आन लगाई।माई की ज्योति जगाई।प्रकट हो शम्भु शिवानी काली माई।इतनी वार कहाँ लगाई।भोग मांगे माई।लुहानी धार लगाई।जुगत जाई।ॐ क्रीम काली प्रकट प्रकट कुहद देहीवासिनी ॐ फट स्वाहा।इतना काली मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ गुरु गोरक्ष नाथ जी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।



धूप करने का मन्त्र

धूप करने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी धूप कीजै धूपिया कीजै वासना कीजै।जहाँ वास वहाँ देव।जहां देव वहाँ गुरुदेव।जहाँ गुरुदेव वहाँ फूल पूजा।अलख निरंजन एक और नही दूजा।गौघृत गुग्गल वास।तृप्त हो नवनाथों के नाथ श्री सदाशिव शम्भुजती गुरू गोरक्ष नाथ और तैतीस कोटि देवी देवता भेंक भगवान।प्रथम धूप सतगुरु को कीजै मोक्ष मुक्ति का फल लीजै।दूसरी धूप माता पिता की कीजै।दया धर्म की शिक्षा लीजै।तीसरी धूप कुलदेवी कुलदेव कुलगुरु की कीजै।जगत में नर नारी जीवों की सेवा कर परमार्थ कीजै।चौथी धूप तैतीस कोटि देवी देवताओं की कीजै।काल कण्टक ने निर्भय रहीजै।पाँचवी धूप पंच तत्वों की कीजै।प्रकृति का भेद जानिजै।कहे भृतहरि सुनो गोपीचन्द ये पंच धूप कीजै।काया खोज अमिरस पीजै।इतना धूप दान मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।उज्जयिनी नगरी महाकालेश्वर महादेव जी के सन्मुख बैठ राजा भृतहरि नाथजी ने राजा गोपीचन्द नाथजी को पढ़ कथ कर सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी की आदेश।आदेश।आदेश

भोग लगाने का मन्त्र
सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी लगे भोग कटें चौरासी रोग।अन्न भूतों दानी अन्न भूतों पानी।अन्न खाया अलील पिया।उसी की पूजा उसी का पुण्य।योगी अवधूत और ना पुण्य।कहे महादेव जी सुनो गौरां पार्वती अन्न दाता सदा सुखी।वस्त्र दाता कमलापति सदा सुखी।दे भोग सन्तोषी खायें।उसी की वासना तीन लोक चौदह भुवन सप्त पाताल में जायें।इतना भोग दान मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।कैलाश पर्वत की शिला पर गादी बैठ महादेव जी ने गौरां पार्वती माई को कान में सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

बत्ती बनाने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजीओउम धरती सोहंम आकाश।महाअंग धरती महाशुन्य आकाश।उन सिद्धा लिया निवास।पंच महेश्वर घटी तलाई।गुरु गोरक्ष नाथजी के वचन से भृतहरि गोपीचन्द ने बत्ती बनाई।इतना बत्ती बनाने का मन्त्र सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

ज्योति पात्र में सार(घी) डालने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी सार सार महासार।सार परसो ज्योति चेते भुजा पसार।रक्षा करें गुरु गोरक्ष नाथ।इतना ज्योति में सार डालने का मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ महादेवजी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

ज्योति जलाने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ओउम ज्योति सोहंम ज्योति।शिव ज्योति शक्ति ज्योति।चारों ज्योति मिल इक्कठी भई।हस्तक ले मस्तक चढ़े आदि ज्योति कहाँ से आई।गुरु गोरक्ष नाथ जी के हुकम से आई।किसने चेताई।गोपीचन्द भृतहरि ने चेताई।किस किस ने जगाई।नवनाथ चौरासी सिद्धो ने जगाई।पीर पैग़म्बरों ने जगाई।धवल कंवल ने जगाई।चेतन हुई अखण्ड ज्योति अमर भई काया।महादेवजी और गौरां पार्वती माई ने ध्यान लगाया।ले हाथ में अंकुश गौरी नन्द गणेश आया।ले हाथ में खप्पर त्रिशुल काली पुत्र काल भैरव आया।ले हाथ में गदा अंजनी सुत हनुमान जी आया।चारों ने मिलकर अखण्ड ज्योति का दर्शन पाया।दर्शन हुई ज्योति वज्जर की भई हाड़ चाम की काया।इतना अखण्ड ज्योति मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शुन्य की गादी बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

कलश स्थापना करनें का मन्त्र

कलश स्थापना करनें का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी गंगाजल सर्वोत्तम भारी।अलख देव की माया सारी।अलख स्वरूपी कलश मंगाया।अमृत जल उसमें भरवाया।कलश पुर कर ध्यान लगाया।अलख पुरुष खलक में पाया।प्रथम कलश गुरु गोरक्ष नाथ जी ने थरपाया।गोपीचन्द भृतहरि अलख गुण गाया।इतना कलश स्थापना मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

श्रीफल रखने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी सिंहल द्वीप में रहाया।अलख पुरुष माया रचाया।नवखण्ड तँह वासा लीन्हा।तहाँ जाय हम गम जब कीन्हा।जल खण्डी को मारया तभी।देही रत्न को काढ़या जभी।जतन कर महादेवजी वृक्ष लगाया।बंधा हुआ श्रीफल मंगाया।ले श्रीफल अलख पुरुष मन भाया।गोपीचन्द भृतहरि ने गुरु गोरक्ष नाथजी के चरणों में भेंट चढ़ाया।इतना श्रीफल मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

ज्वाहरा बोने का मन्त्र
सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी कौन नगरी कौन प्रधान कौन पुरुष ने थापे थान।शिवपुरी नगरी शिव शक्ति प्रधान।सतगुरु ने थापे थान।भृतहरि बोये ज्वाहरा गोपीचन्द करें जाप।रक्षा करें गुरु गोरक्ष नाथ।इतना ज्वाहरा बोने का मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश

दूर्वा चढ़ाने का मन्त्र
सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी उत्तर दिशा से आनन्दी योगिन आई।दोनों कर से दूर्वा ले आई।दूर्वा चढ़े।पाप कटे।अलख पुरुष तेरी दुहाई।इतना दूर्वा चढ़ाने का मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ गुरु गोरक्ष नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

भगवा बाना धारण करने का मन्त्र

भगवा बाना धारण करने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी अरबद नरबद धुंधुकारा।शिव शक्ति किया विचारा।आओ शक्ति ऐसा कीजै।नख से चीरा उदर के नीचे कीजै।तब शक्ति ने नख से चीर के भग बनाया।शिव ने सूरत निरत योग से लिंग बनाया।भग से निकली रक्त की बुन्दे।रक्त बून्द से गेरू उपाया।गेरू मेरू गिरी पर्वत पर ठहराया।वो गेरू गौरी नन्द गणेश लाया।एक छटाँग गेरू नो छटाँग पानी।संग में अष्ट सिद्धि नवनिधि समाणी।उसमें भगवा चादर रँगाणी।गुरु गोरक्ष नाथ जी ने भगवा भेंष बनाया।अलख निरंजन शब्द सुनाया।गोरक्ष दत्त नानक कबीरा चालिया देशावर कर भगवा भेंष।लीन्हा भेंक भगवान के नीचे उपदेश।नवनाथ चौरासी सिद्धों ने भगवा बाना धारण किया।तब पीछें सर्व सन्यासीयों ने लिया।भगवा बाना आपो आप बना कर्म की रेख।कहे राजा भृतहरि सुनो राजा गोपीचन्द आपही कर्ता आपही अलेख।इतना भगवा बाना मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।अर्बुदांचल पर्वत की शिला पर राजा भृतहरि नाथजी ने राजा गोपीचन्द नाथजी को पढ़ कथ कर सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

लँगोट धारण करने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी सत्य की लँगोट सन्तोष का धागा।सुर नर मुनि ध्यान में लागा।सहज सुख जागा।काल अकाल मौत का भंय भागा।नागा बाँधे नागफणी सन्त बाँधे लँगोट।नहीं आवें क़भी काल काम यम की चोट।बाल गोपाल बाँधे कोपीन नवनाथ चौरासी सिद्धों की ओट।कहे गुरु गोरक्ष नाथजी सुनो गोपीचन्द भृतहरि।गुरु मन्त्र पढ़ बाँधे लँगोट।लिंग में वीर्य स्थिर रहें कभी नहीं पड़े पाप की पोट।इतना लँगोट मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।कैलाश गिरी की शिला पर बैठ श्री सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथजी ने राजा गोपीचन्द नाथजी राजा भृतहरि नाथजी को पढ़ कथ कर समझाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

सूर्य नारायण नमस्कार मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी उगन्त सूर्य नारायण बाजन्त तूर।बरसन्त नूरकाल कण्टक जाहि दूर।हाथ खड़्ग गले पुहुँप की माला।नवखण्ड पृथ्वी में भया उजियाला।त्रिकाल देव सूर्य नारायण स्वरूपी।प्रभाते ब्रम्हा रूपी।मध्याने विष्णु रूपी।सन्ध्याने शिव शंकर रूपी।एकादश जाप जपन्ते।अष्ट सिद्धि नवनिधि फलन्ते।ओउमकार जय जय कार।श्री सूर्य नारायण को नमस्कार।इतना सूर्य नारायण नमस्कार मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ गुरु गोरक्ष नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

आचमन करने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी वरुण देव का जल में वासा।त्रिवेणी में करें निवासा।करें आचमन सुधरें काया।गुरु गोरक्ष नाथजी ने गोपीचन्द भृतहरि को यूं फ़रमाया।अलील पुरुष को बंम बंम।इतना आचमन करने का मन्त्र सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

भोजन करने का मन्त्र

सतनमो आदेश।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी अन्न जल पावन प्रसादी किन्ही।अलख पुरुष को अर्पण किन्हीं।पाओ भोजन प्रेम प्रीता।काल जाल भूख को जीता।भोजन करें गुरु गोरक्ष नाथजी अवधूता।भोजन मन्त्र पढ़ कर भोजन करें।खाया पिया घट में जरें अमर रहे पिण्ड।सतगुरु बैठे इक्कीसवें ब्रम्हाण्ड।इतना भोजन मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने आपो आप सुनाया।श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।