پیر، 26 فروری، 2024

श्री नाथजी के अन्य गायत्री मंत्र

श्री नाथजी के अन्य गायत्री मंत्र

1.श्री हँस बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी हँसा आप हँसा जाप।निर्मल देही ह्रदय रहे न पाप।हँस रूपी।भँवर रूपी।जूनी से न्यारे रहे।एक अलख निरंजन आपो आप।ॐ हँसाय विदमहे महाहँसाय धीमही तन्नो हँस बाला प्रचोदयात।इतना हँस बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।कंदली वन में सिद्धासन बैठ सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथ जी ने राजा गोपीचन्द राजा भृतहरि को कान में सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

2.श्री मृतक बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी डरे डुंगरे रचे धर्मशाला।जहाँ बैठकर धूप ध्यान करें श्री मृतक देव बाला।पूछ लेव कंवारी कन्या।जहाँ सोय पंच महेश्वर।ॐ मृतक बाला विदमहे महामृतक बाला धीमही तन्नो मृतक बाला प्रचोदयात।इतना मृतक बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।हरिद्वार क्षेत्र हर की पैड़ी पर बैठकर श्री सदाशिव शम्भुजती गुरू गोरक्ष नाथ जी ने सिद्ध चौरंगी नाथ जी को कान में सुनाया। श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

3.श्री शंख बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ॐ अज्जर धरती वज्जर काया।देख लो ज्योति प्रमोद लो काया।सवा हाथ का पुतला बैठा अटल ज्योति कि छायां।हाथ में कौलीं मुख में बाला।ह्रदय में जपो तपो श्री त्रिपुर सुन्दरी बाला।ॐ शँखबाला विदमहे महाशंखबालाय धीमही तन्नो हिंगलाजाय प्रचोदयात।इतना शंख बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ श्री सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथ जी ने आपो आप सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

4.श्री सरजीवन बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी अकारे ब्रम्हा,बकारे विष्णु,मकारे महेश।सतशब्द को सींचने सतगुरू आये।आप बोया मूल।मूल पर आया पान।पान पर आया कुर।कुर पर आया फूल।फूल पर आया फल।फल की छायां कौन बैठे।आपका नाम क्या।अदल।अदल कहाँ से आया।शून्य महाशून्य से आया।सूखे से हरिया किया।एकाएकी निराभेंखी।अदल पाया जीव।कहे गुरु गोरक्ष नाथ सुनो गोपीचन्द भृतहरि सुरजीवन बाला गायत्री मंत्र जीव को ले उतरे भवसागर से पार।ॐ सुरजीवन बाला विदमहे चण्डिकाय धीमही तन्नो शिव प्रियाय प्रचोदयात।इतना सुरजीवन बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।कैलाश पर्वत की शिला पर सिद्धासन बैठ श्री सदाशिव शम्भुजती गुरू गोरक्ष नाथ जी ने राजा गोपीचन्द राजा भृतहरि को कान में सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

5. श्री मृत संजीवनी बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ओउम शून्य आकाश।शून्य धरती शून्य ज्योति प्रकाश।ओउम सोहंम संजीवन काया।बीच यम जम का फांस।सतगुरु अविनाशी खेल रचाया।तंत्र संजोगी मृत संजीवनी बाला।फुरो मन्त्र जति गुरु गोरक्षनाथ बाला।महादेव जी मृत संजीवनी विद्या दैत्य गुरु शुक्राचार्य को पढ़ाये।शुक्राचार्य मृत संजीवनी विद्या से मृत शव को जगाये।पुतले में हँसा आके समाये।ह्रदय हिलें गिर्दय चलें।देखो सिद्धों पुतले चलें।कहाँ से आया।कहाँ को जाना।कौन पुरुष ने दीन्हीं छायां।अगम से आया।निगम को जाना।गुरु अविनाशी दीन्हीं छायां।घटे आकाश।घटे पाताल।घटे गतगंगा भरपूर।सूर्य चन्द्रमा सांख भरें।सिद्ध के मुख से बरसे नूर।आओ अवधूत शंख ढालिये।शिव पूजिये।हँसा पावे मोक्ष मुक्ति फल द्वार।कहे गुरु गोरक्ष नाथजी सुनो गोपीचन्द भृतहरि।मृत संजीवनी बाला गायत्री मंत्र का एक सौ आठ बार जप करें।वो योगी मुआ मुर्दा जीवित करें।ॐ महामृत्युंजयाय विदमहे महासंजीवनी बाला धीमहि तन्नो मृत संजीवनी बाल प्रचोदयात।इतना मृत संजीवनी बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।काशी क्षेत्र काशी कोतवाल काल भैरव पींठ पर सिद्धासन बैठ श्री सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथजी ने राजा गोपीचन्द राजा भृतहरि को कान में सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

6.अमृत बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ओउम जपो तपो श्री अमृत बाला।उपज्या अमृत सुन्दरी बाला।आओ चन्द्र बरसाओ अमृत नूर।ध्यान देश में योगी अवधूत।गतगंगा यमुना बाई।बाला सरस्वती शक्ति उपाई।शिव शक्ति मिल पँथ चलाया।नाद बिन्द का अमिरस प्याला।अमर बीज अमर काया।रती तोल नेत्र अंजनी बाला।उठो नारायणी सींचो अमिरस।अवधूत योगी भोगे अहिंरस।सूर्य चन्द्र भरते सांख।राख राख श्री सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथ जी राख।आते यमराज को मार।उड़ते प्राण को राख।गलते हाड़ चाम की काया को राख।अघोर पिण्ड पड़न्ता राख।गतगंगा जायके अनभय प्रकाश।ॐ अमृत हुक्म जापाय विदमहे महाअमृत बाला धीमही तन्नो अमृत बाला प्रचोदयात।इतना अमृत बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।माया मछिन्द्रनाथ जी की मण्डली में अवधूत दत्तात्रेय नाथजी ने राजा गोपीचन्द राजा भृतहरि को कान में सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

काल परमहँस गायत्री मन्त्र

काल परमहँस गायत्री मन्त्र (इसको नाथ पँथ में कालास्त्र भी कहते है)

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ओउम काल,सोहंम काल।काल और महाकाल।अलील मध्ये अज्जर काल।वज्जर काल अनभय काल निर्भय काल।ये पांच काल हमारे पास।अमर काल भँवर काल ज्योति काल सरजीवन काल ये पांच काल हमारे सतगुरू।हमारे कारण दुनियां मरे जरें।ब्रम्हा जी सृष्टि की रचना करें।विष्णु जी सृष्टि का पालन करें।महेश सृष्टि का संहार करें।नवखण्ड पृथ्वी को शेषनाग सिर पर धारण करें।सात वार बारह राशि पन्द्रह तिथि सत्ताईस नक्षत्र घटे बढ़े चलें।काल परमहँस गायत्री मंत्र को कौन जपन्ते।शिव जपन्ते।ओउम तो कौन।सोहंम तो कौन।तत्व तो कौन।ओउम तो शिव सोहंम तो शक्ति।परमहंस तत्व।ओउम हर हर हर महादेव।बंम बंम बंम।दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मुआ मुर्दा सरजीवन किया।अलील की काया।अलील की माया।अलील पुरुष ने घट पिण्ड को आन चेताया।गले नहीं हाड़ चाम की कोठी स्थिर रहें नाद बिन्द की काया।माया मछिन्द्रनाथ जी ने काल परमहँसास्त्र चलाया।किलकारी मार कालिका माई ने काल को भगाया।काली कंकाली महाकाली।कृष्ण वर्णी।शव वाहिनी।रुद्रदेवता की पोषणी।हाथ खड़ग खप्पर धारिणी।गले मुण्डमाला।हंसमुखी।जिव्हा ज्वाला।दन्तकाली।मधमांसकारी चौपटा मढ़ी मसान की रानी।मांस खायें।मध पी पीवें।रिद्धि सिद्धि लियाओ भस्मन्ती माई।भस्मन्ती माई जहाँ पर पाई।तहाँ रमाई।सत्य की नाती।धर्म की बेटी।इन्द्र की साली।अचलनाथ की चेली।काल की महा काली।नागों की नागिन।जोग को जोगिन।भोग की भोगिन।मन माने तो संग रमाई।नहीं तो मढ़ी मसान में फिरे अकेली।बावन भैरव चौसठ योगिनी छप्पन कलुवा।बोल बंम बंम काली माई की दुहाई।घोर काली अघोर काली।अज्जर काली वज्जर काली।भख जून निर्भय काली।अला बला भख।पापी पाखण्डी को भख।जति सती को रख।ओ काली माई तुम बाला ना वृद्धा।देव ना दानव।नर ना नारी।देवी जी तुम तो हो स्वंय परब्रम्ह काली।प्रथमें काली।द्वितीय कालरात्रि।तृतीय कपालिनी।चतुर्थे काम सुंदरी।पंचमी कामिनी।षष्टमें विरूपाक्षी।सप्तमे उग्रा।अष्टमे घोर रूपा।नवमे नरसिहीं दसमें वराही एकादशे रुद्रा द्वादशे डाकिनी।कालिका देवी के द्वादश नाम ह्रदय में ध्याऊँ।दो हाथ जोड़ तैतीस कोटि देवी देवताओं को जगाऊँ।कहे गुरु गोरक्ष नाथ सुनो नवनाथ चौरासी सिद्धो काल परमहँस गायत्री मंत्र का सुमिरण करें।नाद बिन्द जांके घट जरें।तांकि सेवा ऋद्धि सिद्धि करें।तीन चुल्लू पानी के भरें।निर्भय जोगी जंगल फिरे ।मढ़ी मसान फिरे, फिरे सारे ब्रम्हाण्ड।अनहद नाद घूंघर बोल।गुरु शब्द गुरु ज्ञान।भरे संसार झरें संसार।फिरे योगी अनभय काल।कालिका माई हमारी तुमारी माई।हमको तुमको छोड़ और को ले जाई।तो नवखण्ड पृथ्वी माई में हल चल मच जाई।ॐ कालाय विदमहे महाकालाय धीमहि तन्नो काल परमहँसाय प्रचोदयात।इतना काल परमहँस गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।गंगा गोदावरी त्रयम्बक क्षेत्र कौलागढ़ पर्वत की अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्ष नाथ जी ने नवनाथ चौरासी सिद्ध बारह पंथी अनन्त कोटि सिद्धो को पढ़ कथ कर सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

श्री श्री १००८

चौदहवीं/अघोर गायत्री मंत्र

चौदहवीं/अघोर गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी ओउमकार ओउमकार में ब्रम्हा विष्णु महेश।ब्रम्हा विष्णु महेश में पंच तत्व।पंच तत्व की उत्पन्नी काया।काया में प्रगटी ज्योति।ज्योति में जागी प्रेम ज्योति।प्रेम ज्योति को प्रथम गौरां पार्वती देवी ने उपजाया।आचार विचार कर सरस्वती देवी ने अघोर रचाया।अघोर अघोर महाअघोर।गणेश जी का गजमुख वो भी अघोर।ब्रम्हा जी का कमण्डल वो भी अघोर।विष्णु जी का सुदर्शन चक्र वो भी अघोर।महादेव जी का त्रिशुल वो भी अघोर।कालिका देवी का नृत्य वो भी अघोर।माता अनुसुइया का सतीत्व वो भी अघोर।त्वष्टा ऋषि का यज्ञपुत्र त्रिशरा वो भी अघोर।पवन देव की गति वो भी अघोर। कामदेव की रति वो भी अघोर।नर और नारायण की उर्वशी अप्सरा वो भी अघोर।नारी ओर नर का समागम वो भी अघोर।नारी का भग वो भी अघोर।पुरुष का लिंग वो भी अघोर।भग में लिंग वो भी अघोर।भग में रज वो भी अघोर।लिंग में बिन्द वो भी अघोर।रज बिन्द का पिण्ड वो भी अघोर।कहे सिद्ध कानिफा नाथ सुनो रानी मैंनावन्ती अघोर में अघोर ब्रम्हा जी ने मिलाया।तब नर नारी उपजाया।अघोर गुदा में रहे मस्तक बसे महेश।सुपारी में गणेश विराजै काल भैरव बसे मढ़ी मसान हमेश।गुरु गोरक्षनाथ का चेला भृतहरि तन वश में कर, बांधे घट में मन की लँगोट।काम क्रोध नहीं उपजै काया में, नहीं लागे पिण्ड में काल और दुश्मन की चोट।गौरां पार्वती देवी अघोर गायत्री मंत्र का जप करें।तो शिव के ह्रदय में स्थान मिलें।अघोर गायत्री जरें अज़रा जरें।पीओ वहाँ अमृत का प्याला।अभय मण्डल में सती वाचा।हम को तार।इस जीव के पाप संहार।कुंडे को सुधार।कुंडे में अट्ठारह भार वनस्पति पंच मुद्रा श्रीफल ले के स्थापना की।लक्ष्मण जति उठाया श्रीफल श्रीफल पर सिन्दूर।सिन्दूर चढ़ाया सती सीता माई।सीता माई के सत से रामचन्द्र जी ने अहिल्या उद्धारी।विश्वामित्र ऋषि ने अगम लोक से अघोर गायत्री उतारी।अघोर गायत्री तु तारणी तु तारती।चाचरी भूचरी।खेचरी अगोचरी उन्मुनी।वो निजिया धर्म पद की।रावण नाथ की ।अघोर गायत्री चलें।लंका जरें।भग जरें।रज जरें।लिंग जरें।बिन्द जरें।उसकी रक्षा अलख अविनाशी गुरु गोरक्षनाथ जी करें।गो हत्या,बाल हत्या,स्त्री हत्या,मोर हत्या चोर हत्या ये पंच हत्या टलें।नवखण्ड धरती माई पे लगे जीव को पंच दोष।पितृ दोष,काल सर्प दोष,ग्रह दोष,घृणा दोष,निन्दा दोष।इतने पंच दोष को दूर नहीं करें ।तो माया मछिन्द्र नाथ की करोड़ करोड़ दुहाई फिरें।।अघोर गायत्री ही अलख पुरुष का नाम।जहाँ ज्योति वहाँ परमज्योति।जहाँ परमज्योति वहाँ अलख पुरुष का वासा।अलख पुरुष की जपो अघोर गायत्री टलें काल का पांसा।अलख पुरुष का प्रेम से प्याला पिया।तो प्रचण्ड पाप परले हुआ।मढ़ी मसान का मुआ मुर्दा अघोर गायत्री मंत्र से सरजीवन हुआ।ॐ अघोराय विदमहे महाअघोराय धीमहि तन्नो अघोराय प्रचोदयात।इतना अघोर गायत्री मंत्र सम्पूर्ण भया।कामरूदेश की कामाक्षा देवी शक्ति पीठ में बैठ कर सिद्ध कानिफा नाथ जी ने राणी मैंनावन्ती को पढ़ कथ कर सुनाया।श्री नाथजी गुरूजी को आदेश।आदेश।आदेश।

श्री श्री १००८ 

अघोर बाला गायत्री मंत्र

अघोर बाला गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी सोने की इंद्री रुपे की धार।धरती माई आपको कोटि कोटि नमस्कार।धर्म की धोती अलील का प्याला।अजरी वजरी चेते गुरु गोरक्षनाथ बाला।धरती की डिब्बी।शक्ति ने बाली।ब्रम्हा विष्णु महेश ने लकड़ी डाली।शिव ने रान्धी।शक्ति ने खाई।अन्नपूर्णा महामाई।हाथ खड़्ग खप्पर गले मुण्डमाला।शिव शक्ति जपो तपो श्री त्रिपुर सुंदरी बाला।ॐ अमरी बांधे अमरी बज्जरी बांधे काया।हाथ जोड़ हनुमन्त खड़ा।बांध ल्याऊं शरीर सारा।नोमण सार भस्म कर डाला।सोने की सुराही रुपे का प्याला।भर भर पियें काल भैरव मतवाला।भजो भजो अलील पुरुष भजो।अनादि फुरो।ऋद्ध फुरो।सिद्ध अलील भजो।अलील पुरुष की चरण कमल पादुका को नमस्कार।ॐ आदि अलील पुरुष की माया।जपो अघोर बाला गायत्री मंत्र अमर रहे काया।अघोर अघोर महा अघोर।ब्रम्हा जी का वचन अघोर।विष्णु जी का शेषनाग अघोर।।महादेव जी की जटा अघोर।हनुमान जी की गदा अघोर।युधिष्ठिर का धर्म अघोर।कामाक्षा देवी का रज अघोर।मेरी वज्जर की काया।जुगति सो मुक्ति।आवें सो जावें।सिद्ध होय वहाँ काल न आवें।कहे लक्ष्मण जति सुनो राजा रामचन्द्र जी श्री अघोर बाला गायत्री मंत्र नित जपे तपे।बारह कोस काल निकट नहिं आवें।ॐ अघोर बाला विदमहे अन्नपूर्णा देवी धीमहि तन्नो अघोर बालाय प्रचोदयात।इतना अघोर बाला गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।गोरक्ष टिल्ले शिवपुरी धाम पर सिद्धासन बैठ लक्ष्मण जति ने राजा रामचन्द्र जी को पढ़ कथ कर सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश

श्री श्री १००८

हुकम गायत्री मंत्र

हुकम गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी हुकुम से रची धरती।हुकुम से रचे पवन पाणी प्रकाश।हुकुम से रची मेंरुं मेदिनी गिरी पर्वत कैलाश।हुकुम चलाया ईश्वर आदिनाथ।हुकुम से पंचतत्व का भया प्रकाश।हुकुम से ब्रम्हाजी भर दीन्हीं सांख।हुकुम से हनुमन्त वीर चलाई हाँक।हुकुम से गादी गोरक्ष पीर।हुकुम से शक्ति आद ततबीर।हुकुम से कुबेर भण्डारी ऋद्धि सिद्धि पाई।हुकुम से टेलुआ टेल कमाई।हुकुम से अंत चक्र पूर।हुकुम से गत में बरसे नूर।हुकुम से काल भैरव प्रकाश।हुकुम से काल भैरव त्रिपुर बाला सुंदरी के पास।केशर हुकुम पीर मुख चलें।हुकुम बिन मंथन न हिलें।टेलुआ केशर मथकरी त्यार।जुगति चढ़ी देव दरबार।केशर सुरती हैं जग मैंसा।आप ही गुरु आप ही चेला।जुगति संग कौन कौन आय।ब्रम्हा विष्णु महेश आय।जुगति संग सूर्य चन्द्र दो तपे निराधार।जुगति संग धर्मराज धर्मगुसांई जी ले उत्पन्न भये सकल सृष्टि संसार।टेलुआ ठाड़ा दो कर जोड़ देव दरबार।हुकुम होय अलख पुरुष का टेल करूँ हिंगलाज माई के दरबार।आदि का योगी अनादि की माया।सत्य का योगी वज्जर की काया।करें करें न करें।तो भी बहार भीतर कभी न मरें।एकांगन गन्धर्व जाया।छीजै न उपजै विनसे न काया।शब्द होय तां काल न खाया।माया मछिन्द्रनाथ जी ने हुकुमास्त्र चलाया।हुकुम हुकुम करन्ता काल भैरव आया।ओउम सोहंम का सकल पसारा।काल भैरव का आया प्रवाना।उड़ गई तृष्णा काल का स्थानां।परमतत्व के दर्शन कीजै।सुरती सदा गगन घर दीजे।जोगी जुगति में रह्या समाय।तां हंसा को काल न खाय।कहे अवधूत दत्तात्रेय नाथ जी सुनो दसनामी सिद्धो सत्य का सन्त अमरापुर वास।आओ हंसा डरो मति।करो काल भैरव से प्रीति।काल भैरव शिवपुरी पहुँचासी।भागे काल कण्टक मिटें लख चौरासी ।सत्य का योगी युगत की काया।सतगुरु शब्द पर ध्यान लगाया।घट पिण्ड अष्ट कमल वज्जर की काया।शून्य ओउमकार में शिव पार्वती साकार।तब उपजा ब्रम्हण्डाकार।यही जोग महादेव पार्वती ने लिया।यही जोग छहः जतियों को गुरु गोरक्षनाथ जी ओर सात सतियों को माता अनुसुइया ने दिया।यही जोग हमने तुमने पाया।ओउम सोहंम जाप।सतगुरु शब्द ही अजपा जाप।काल भैरव ही सतगुरु आप।ओउम पुरो आसन पवन की माला।ह्रदय में जपो तपो श्री काल भैरव बाला।थान मुकाम की चढ़ती कला।जुमलें में जागते रहें।काल पुरुष ओर यमदूत अला बला कण्टक भागते रहें।भेंक कि टेक बाने की लाज।जिसको राखें सदाशिव शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ भेंक भगवान।भृगु तारा उगिया काली पुत्र काल भैरव मारी हाँक।हंसा घर बार छोड़ मोह माया त्याग अमरापुर पधारिया दैत्य गुरु शुक्राचार्य ओर अलील पुरुष की सांख।अलील अलील पर थल।थल पर भौंर नदी।भौंर नदी पर शिवजात पुरी।शिवजात पुरी में ब्रम्ह कँवल।ब्रम्ह कँवल में निरंजन कँवल।निरंजन कँवल मध्ये उत्पन्न भई माता हुकुम गायत्री।हुकुम गायत्री माई आवें।ओउमकार करन्ती आवें।इकोत्तर सो पुरुषां ले अमरापुर जावें।सोहंमकार करन्ती आवें।लख चौरासी जीया जून को ले चोंगा आहार पानी पिलावें।क्षीर नीर नू पंच बस करनी आवें।जपंत ब्रम्हा विष्णु महेश।पवन पानी नवलख तारा।षट दर्शन मध्ये सतगुरु खड़ा।हाथ खड़ग त्रिधारा।क्या करेगा रूठा जगत हमारा।चार चरण पंचवा मुख अन्न महेश्वर जोगी।अनन्त कोटि सिद्धो को पार ले उतरेगी।हमको तुमको भी भवसागर से पार ले उतरेगी।माता हुकुम गायत्री। राखो हुकुम गायत्री माई लाज हमारी।मैं श्री नाथजी गुरुजी का बालक।लीले का असवार।भेंक भगवान का ग्वाल।ॐ आदिशक्ति विदमहे योगमाया धीमहि तन्नो चण्डिकाय प्रचोदयात।इतना हुकुम गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।गिरिनार गिरी की शिला पा सिद्धासन बैठ अवधूत दत्तात्रेय नाथ जी ने दसनामी सिद्धो को पढ़ कथ कर सुनाया श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश आदेश।

श्री श्री १००८

सरभंग गायत्री मंत्र

चतुर्थ/सरभंग गायत्री मंत्र

सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।ॐ गुरुजी काला घोड़ा काला पलान।जिस पर चढ़े सुलेमान पठान।कौन हिन्दू कौन मुसलमान।कौन का बांध्या जमीन और आसमान।तारिया सतगुरु जागिया मुआ मुर्दा औऱ चौपटा मढ़ी मसान।में सैंया बाबा रहमान।तले धरती धीर धरावै।ऊपर अम्बर सकल पर सोहे।सरभंग पुनः सकल पर ब्यापै।सरभंग इन सकल पर गाजै।चन्द्र सरभंग सकल पर ब्यापै।सरभंग सूर्य की किरण चंद्रमा की ज्योति।मैं सरभंगी चारो वर्ण ओर डाकिनियों का संगी।पापी पाखंडी और दुराचारी को राह बताऊं।सारे जगत को भेद बताऊंगा।मैं औघड़ का चेला।नवखण्ड पृथ्वी पर रम्मत करूँ अकेला।नहीं मैं किसी को भी शीश नवाऊँगा।ऊंचा नीचा राजा पकड़ू एक ही प्याला पिलाऊंगा।पात्र कर पवित्र कर लूं।भ्रांति कभी ना ल्याऊंगा।मैं भटियारी।कामणगारी।कामनिगारी।घर घर लाय लग्यादू न्यारी न्यारी।कामण टूमण करूँ सनेवा।राखूं बरसता मेहवा।शिखर छोड़ दूयूं पाणी।पड़ता कबहुँ न मागे पाणी।जोर करें जाने न दू।इंद्री पकड़ निवाऊँगा।तले को आकाश।ऊपर को धरती माई।उलटी राह चलाऊंगा।राजा को करदयूं काला मेंढा।हाकिम करदूयूँ भैसा।नवनाथ चौरासी सिद्ध बारह पंथियों में बोलूं ऊँचा ऊँचा।क्या त्यागी।क्या बैरागी।क्या सन्यासी।क्या सेवड़ा भोपा भरड़ा भांड।इतने को मूंड माई।मच्छेरी का माथा मुण्ड।मच्छेरण्डी का मुण्ड माथा।मत बांध कुड़ कपट का गाथा।जोगी बड़ा जुगति के मांही।भीतर धरिया ध्यान।जोग सर नख करदूयूँ न्यारा न्यारा।उलटा चरखा चलाऊंगा।उलटा साद समेंटू वाणी।गुरु गोरक्ष नाथजी बोल्या उलटी वाणी।कुँवे ऊपर चादर तानी।मढ़ी मसाण में धूणी घालु।आसन डालूँ डेरा।जगत बुलाऊँ डेरे।हरी लीरी।बावन भैरव चौसठ योगिनी छप्पन कलुआ सवालाख भुतावली सात कामणगारी नो नाहर सिंह।सात बायाँ बीच भायेली वाही म्हारी दासी।उठ मुठ कामण करतूत छल छत्तर धक्का धूम।भूत प्रेत शैतान जिन्द कसाई काचिया मसाण।जलोटिया फलोटिया।चुड़ैल पिशाचिनी मेहतरानी।नजर टपकार। जोगनी तुर्कनी चमारी धोबिन तेलिन।छत्तीस रोग ओर बहत्तर बला बांध बांध कर जल्दी जल्दी लाय।मेरा हकाला कारज सिद्ध नहीं करे तो राजा रामचन्द्र जी लक्ष्मण जति सती सीता माई की करोड़ करोड़ दुहाई फिरे।थल सोधु ओर आसन सोधु सोधु तीजी ताली।इतरे में अटकाऊँ नाड़ा।कदेई न निकले बाला।सूखा छोड़ गर्भ में राखें।तीजी घड़ी बड़ाऊँ बाला।धीरो करो अपचार चलाऊँ।आखर आगे चले ना पाखर।मारूँ मेंख वज्जर की टक्कर।मन्त्र उड़द का गोला बाऊं।पत्थर फोड़ के उड़ाऊँ।सिद्धाई का मुण्डा पकड़ ठोक दूयूँ धड़ के मांही।टिकालिया मसाण की छाईं।लागे फक्कड़ की टक्कर।जंगीसा बादशाह होज्या सुख साख लक्कड़। गुरु गोरक्षनाथ के गोपीचन्द भृतहरि दोऊँ चेले।गढ़ गिरिनार में तपे अकेले।गोपीचन्द और भृतहरि चेतावे चण्डी माई।बंगाल खण्ड कामरू देश से चली चण्डी माई। चण्डी माई हाथों में कंगन काली जटा।माथे सिन्दूर गलें नर मुंडो की माला।चण्डी माई नृत्य करें मढ़ी मसाण चौपटा।चल चल चण्डी माई।नहीं चले तो चरपटी नाथ जी लाख लाख दुहाई।आओ चण्डी माई। उखाड़ो दुश्मन की भुजा।काटो काल की मुण्डी।यमदूतों के पाँवों में डालो बेड़ी।चण्डी चण्डी ।फिरे नवखण्डी।इतना सरभंग गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।गढ़ गिरिनार की शिला पर सिद्धासन बैठ माया मछिन्द्र नाथ जी ने गुरु गोरक्ष नाथ जी को कान में सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।

श्री श्री १००८

सर्व रोग नाशक हनुमान मंत्र

सर्व रोग नाशक हनुमान मंत्र

मंत्र:- कौरव पांडव कहां गए बन मे गए, बन में क्या करेंगे, बन कटवाएंगे, बन कटवा कर क्या करेंगे, सहस्त्र मन कोयला करेंगे, सहस्त्र मन कोयले का क्या करेंगे, छप्पन छुरी बनाएंगे, छप्पन छुरी का क्या करेंगे, बाय को, फोड़े को ,चीस को, खांसी को , भड़क को, फुंसी को, टोक को, नजर को, सिर- दर्द को, काट पीट के खारे समुंद्र में बहाएंगे, खारे समुद्र में बहा कर क्या करेंगे , बहोड़ (दोबारा ) के उल्टे ने आवे ईश्वरो वाचा पिंड काचा मेरे गुरु का शब्द है साचा देखूं रे बाबा हनुमान तेरे शब्द का तमाशा।

विधि:- इस मंत्र की क्रिया 21 दिन की है साधक बाबा हनुमान जी के सभी नियमों का पालन करते हुए एक माला जप 21 दिन तक हर रोज करें आपका मंत्र सिद्ध हो जाएगा फिर आवश्यकता पड़ने पर मोर के पंख द्वारा या चिमटे द्वारा इस मंत्र द्वारा झाड़ा देने से सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है। श्री

ہفتہ، 25 نومبر، 2023

श्री बगला प्रत्यंगिरा कवच | शत्रु निवारण कवच

श्री बगला प्रत्यंगिरा कवच | शत्रु निवारण कवच

विनियोग:

ॐ अस्य श्री बगला प्रत्यंगिरा मंत्रस्य नारद ऋषिः स्त्रिष्टुपछन्दः प्रत्यंगिरा देवता ह्लीं बीजं हूँ शक्तिः ह्रीं कीलकं ह्लीं ह्लीं ह्लीं ह्लीं प्रत्यंगिरा मम शत्रु विनाशे विनियोगः |


ॐ प्रत्यंगिरायै नमः प्रत्यंगिरे सकल कामान साधय मम रक्षां कुरु कुरु सर्वान शत्रुन खादय खादय,मारय मारय,घातय घातय, ॐ ह्रीं फट स्वाहा |

ॐ भ्रामरी स्तम्भिनी देवी क्षोभिणी मोहिनी तथा |

संहारिणी द्राविणी च जृम्भणी रौद्ररूपिणी ||

इत्यष्टौ शक्तयो देवि शत्रु पक्षे नियोजताः |

धारयेत कण्ठदेशे च सर्व शत्रु विनाशिनी ||


ॐ ह्रीं भ्रामरी सर्व शत्रून भ्रामय भ्रामय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं स्तम्भिनी मम शत्रून स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं क्षोभिणी मम शत्रून क्षोभय क्षोभय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं मोहिनी मम शत्रून मोहय मोहय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं सँहारिणी मम शत्रून संहारय संहारय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं द्राविणी मम शत्रून द्रावय द्रावय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं जृम्भिणी मम शत्रून जृम्भय जृम्भय ॐह्रीं स्वाहा |

ॐ ह्रीं रौद्रि मम शत्रून संतापय संतापय ॐ ह्रीं स्वाहा |

ہفتہ، 11 نومبر، 2023

ॐ श्री काल भैरव बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मंत्र

ॐ श्री काल भैरव बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मंत्र

ॐ श्री काल भैरव बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मंत्र ॐ अस्य श्री बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मन्त्रस्य सप्त ऋषिः ऋषयः, मातृका छंदः, श्री बटुक भैरव देव…

ॐ श्री काल भैरव बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मंत्र

ॐ अस्य श्री बटुक भैरव शाबर स्तोत्र मन्त्रस्य सप्त

ऋषिः ऋषयः, मातृका छंदः, श्री बटुक भैरव

देवता, ममेप्सित कामना सिध्यर्थे विनियोगः.

ॐ काल भैरु बटुक भैरु ! भूत भैरु ! महा भैरव

महा भी विनाशनम देवता सर्व सिद्दिर्भवेत .

शोक दुःख क्षय करं निरंजनम, निराकरम

नारायणं, भक्ति पूर्णं त्वं महेशं. सर्व

कामना सिद्दिर्भवेत. काल भैरव, भूषण वाहनं

काल हन्ता रूपम च, भैरव गुनी.

महात्मनः योगिनाम महा देव स्वरूपं. सर्व

सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु ! महा भैरव

महा भय विनाशनम देवता. सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ त्वं ज्ञानं, त्वं ध्यानं, त्वं योगं, त्वं तत्त्वं, त्वं

बीजम, महात्मानम, त्वं शक्तिः, शक्ति धारणं

त्वं महा देव स्वरूपं. सर्व सिद्धिर्भवेत. ॐ काल भैरु,

बटुक भैरु, भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता. सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ कालभैरव ! त्वं नागेश्वरम नाग हारम च त्वं वन्दे

परमेश्वरम, ब्रह्म ज्ञानं, ब्रह्म ध्यानं, ब्रह्म योगं,

ब्रह्म तत्त्वं, ब्रह्म बीजम महात्मनः, ॐ काल भैरु,

बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.

त्रिशूल चक्र, गदा पानी पिनाक धृक ! ॐ काल

भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं विना गन्धं, विना धूपम,

विना दीपं, सर्व शत्रु विनाशनम सर्व

सिद्दिर्भवेत विभूति भूति नाशाय, दुष्ट क्षय

कारकम, महाभैवे नमः. सर्व दुष्ट विनाशनम सेवकम

सर्व सिद्धि कुरु. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,

महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व

सिद्दिर्भवेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं महा-ज्ञानी , त्वं महा-

ध्यानी, महा-योगी, महा-बलि, तपेश्वर !

देही में सर्व सिद्धि . त्वं भैरवं भीम नादम च

नादनम. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव

महा भय विनाशनम देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ! अमुकम मारय मारय,

उच्चचाटय उच्चचाटय, मोहय मोहय, वशं कुरु कुरु.

सर्वार्थ्कस्य सिद्धि रूपम, त्वं महा कालम ! काल

भक्षणं, महा देव स्वरूपं त्वं. सर्व सिद्ध्येत. ॐ काल

भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं गोविन्दं गोकुलानंदम !

गोपालं गो वर्धनम धारणं त्वं! वन्दे परमेश्वरम.

नारायणं नमस्कृत्य, त्वं धाम शिव रूपं च. साधकं

सर्व सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,

महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व

सिद्दिर्भवेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं राम लक्ष्मणं, त्वं श्रीपतिम

सुन्दरम, त्वं गरुड़ वाहनं, त्वं शत्रु हन्ता च, त्वं यमस्य

रूपं, सर्व कार्य सिद्धि कुरु कुरु. ॐ काल भैरु, बटुक

भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम देवता!

सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं ब्रह्म विष्णु महेश्वरम, त्वं जगत

कारणं, सृस्ती स्तिथि संहार कारकम रक्त बीज

महा सेन्यम, महा विद्या, महा भय विनाशनम .

ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु, महा भैरव महा भय

विनाशनम देवता! सर्व सिद्दिर्भवेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं आहार मध्य, मांसं च, सर्व दुष्ट

विनाशनम, साधकं सर्व सिद्धि प्रदा.

ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अघोर अघोर, महा अघोर,

सर्व अघोर, भैरव काल ! ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत

भैरु, महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व

सिद्दिर्भवेत.

ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं, ॐ आं क्लीं क्लीं क्लीं, ॐ आं

क्रीं क्रीं क्रीं, ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं, रूं रूं रूं, क्रूम क्रूम

क्रूम, मोहन ! सर्व सिद्धि कुरु कुरु. ॐ आं

ह्रीं ह्रीं ह्रीं अमुकम उच्चचाटय उच्चचाटय, मारय

मारय, प्रूम् प्रूम्, प्रें प्रें , खं खं, दुष्टें, हन हन अमुकम

फट स्वाहा, ॐ काल भैरु, बटुक भैरु, भूत भैरु,

महा भैरव महा भय विनाशनम देवता! सर्व

सिद्दिर्भवेत.

ॐ बटुक बटुक योगं च बटुक नाथ महेश्वरः. बटुके वट

वृक्षे वटुकअं प्रत्यक्ष सिद्ध्येत. ॐ काल भैरु बटुक भैरु

भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व

सिद्दयेत.

ॐ कालभैरव, शमशान भैरव, काल रूप कालभैरव !

मेरो वैरी तेरो आहार रे ! काडी कलेजा चखन

करो कट कट. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव

महा भय विनाशनम देवता सर्व सिद्दयेत.

ॐ नमो हँकारी वीर ज्वाला मुखी ! तू दुष्टें बंध

करो बिना अपराध जो मोही सतावे, तेकर

करेजा चिधि परे, मुख वाट लोहू आवे. को जाने?

चन्द्र सूर्य जाने की आदि पुरुष जाने. काम रूप

कामाक्षा देवी. त्रिवाचा सत्य फुरे,

ईश्वरो वाचा . ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !

महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व

सिद्दयेत.

ॐ कालभैरव त्वं डाकिनी शाकिनी भूत

पिसाचा सर्व दुष्ट निवारनम कुरु कुरु साधका-

नाम रक्ष रक्ष. देही में ह्रदये सर्व सिद्धिम. त्वं

भैरव भैरवीभयो, त्वं महा भय विनाशनम कुरु . ॐ

काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय

विनाशनम देवता सर्व सिद्दयेत.

ॐ आं ह्रीं. पश्चिम दिशा में सोने का मठ, सोने

का किवार, सोने का ताला, सोने की कुंजी,

सोने का घंटा, सोने की संकुली.

पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.

दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.

तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,

चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,

पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,

जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल

बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,

जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,

तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,

श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.

त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु

बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता सर्व सिद्दयेत.

ॐ आं ह्रीं. उत्तर दिशा में रूपे का मठ, रूपे

का किवार, रूपे का ताला,रूपे की कुंजी, रूपे

का घंटा, रूपे की संकुली. पहली संकुली अष्ट

कुली नाग को बांधो. दूसरी संकुली अट्ठारह

कुली जाती को बांधो.

तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,

चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,

पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,

जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल

बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,

जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,

तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,

श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.

त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु

बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता सर्व सिद्दयेत.

ॐ आं ह्रीं. पूरब दिशा में तामे का मठ, तामे

का किवार, तामे का ताला,तामे की कुंजी,

तामे का घंटा, तामे की संकुली.

पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.

दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.

तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,

चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,

पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,

जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल

बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,

जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,

तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,

श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.

त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु

बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता सर्व सिद्दयेत.

ॐ आं ह्रीं. दक्षिण दिशा में अस्थि का मठ,

तामे का किवार,

अस्थि का ताला,अस्थि की कुंजी,

अस्थि का घंटा, अस्थि की संकुली.

पहली संकुली अष्ट कुली नाग को बांधो.

दूसरी संकुली अट्ठारह कुली जाती को बांधो.

तीसरी संकुली वैरी दुष्ट्तन को बांधो,

चौथी संकुली शाकिनी डाकिनी को बांधो,

पांचवी संकुली भूत प्रेतों को बांधो,

जरती अग्नि बांधो, जरता मसान बांधो, जल

बांधो थल बांधो, बांधो अम्मरताई,

जहाँ जहाँ जाई,जेहि बाँधी मंगावू,

तेहि का बाँधी लावो. वाचा चुके, उमा सूखे,

श्री बावन वीर ले जाये, सात समुंदर तीर.

त्रिवाचा फुरो मंत्र , ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु

बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता सर्व सिद्दयेत.

ॐ काल भैरव ! त्वं आकाशं, त्वं पातालं, त्वं

मृत्युलोकं, चतुर भुजम, चतुर मुखं, चतुर बाहुम, शत्रु

हन्ता त्वं भैरव ! भक्ति पूर्ण कलेवरम. ॐ काल भैरु

बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .

ॐ काल भैरव ! तुम जहाँ जहाँ जाहू, जहाँ दुश्मन

बेठो होए, तो बैठे को मारो, चालत होए

तो चलते को मारो, सोवत होए तो सोते

को मरो, पूजा करत होए तो पूजा में मारो,

जहाँ होए तहां मरो वयाग्रह ले भैरव दुष्ट

को भक्शो. सर्प ले भैरव दुष्ट को दसो. खडग ले

भैरव दुष्ट को शिर गिरेवान से मारो. दुष्तन

करेजा फटे. त्रिशूल ले भैरव शत्रु चिधि परे. मुख

वाट लोहू आवे. को जाने? चन्द्र सूरज जाने

की आदि पुरुष जाने. कामरूप कामाक्षा देवी.

त्रिवाचा सत्य फुरे मंत्र ईश्वरी वाचा. ॐ काल

भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय विनाशनम

देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .

ॐ काल भैरव ! त्वं. वाचा चुके उमा सूखे, दुश्मन मरे

अपने घर में. दुहाई भैरव की. जो मूर वचन झूठा होए

तो ब्रह्म का कपाल टूटे, शिवजी के तीनो नेत्र

फूटें. मेरे भक्ति, गुरु की शक्ति फुरे मंत्र

ईश्वरी वाचा. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !

महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व

सिद्धिर भवेत् .

ॐ काल भैरव ! त्वं.भूतस्य भूत नाथासचा,भूतात्म

ा भूत भावनः, त्वं भैरव सर्व सिद्धि कुरु कुरु. ॐ

काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु ! महा भैरव महा भय

विनाशनम देवता सर्व सिद्धिर भवेत् .

ॐ काल भैरव ! त्वं ज्ञानी, त्वं ध्यानी, त्वं

योगी, त्वं जंगम स्थावरम त्वं सेवित सर्व काम

सिद्धिर भवेत्. ॐ काल भैरु बटुक भैरु भूत भैरु !

महा भैरव महा भय विनाशनम देवता सर्व

सिद्धिर भवेत् .

ॐ काल भैरव ! त्वं वन्दे परमेश्वरम, ब्रह्म रूपम,

प्रसन्नो भव. गुनी महात्मानं महादेव स्वरूपं सर्व

सिद्दिर भवेत्.

प्रयोग :
१. सायंकाल दक्षिणाभिमुख होकर पीपल
की डाल वाम हस्त में लेकर, नित्य २१ बार पाठ
करने से शत्रु क्षय होता है.
२. रात्रि में पश्चिमाभिमुख होकर उपरोक्त
क्रिया सिर्फ पीपल की डाल दक्षिण हस्त में
लेकर पुष्टि कर्मों की सिद्धि प्राप्त होती है,
२१ बार जपें.
३. ब्रह्म महूर्त में पश्चिमाभिमुख तथा दक्षिण हस्त
में कुश की पवित्री लेकर ७ पाठ करने से समस्त
उपद्रवों की शांति होती है.

ॐ परम अवधूताय नमः.

2….उपरी हवा अथवा नकारात्मक ऊर्जा के निराकरण का उपाय
घर के सदस्य या घर पर किसी उपरी हवा का असर महसूस हो तो निम्न उपाय से राहत मिलती है |उपरी हवा के निम्न लिखित संकेत हैं —
घर में भोजन के समय क्लेश होना |घर के छोटे सदस्यों द्वारा बड़ों का अपमान होना |
अचानक आग लगना
अचानक चोरी होना
अचानक छत का गिरना या छत में दरार आना
घर में दीमक लग्न ,घर में सीलन आना |घर में मकड़ी के जाले लगना
घर के सदस्यों में वैचारिक मतभेद रहना
घर की स्त्रियों का मासिक धर्म अनियमित होना
लगातार घर की रसोई में रोटियां जल जाना ,सब्जियां जल जाना
लगातार घर की रसोई में दूध का फटना या बहना
घर में कहीं भी खून के छींटे मिलना |घर के सदस्यों के कपडे फटना ,या जलना या काटना
घर की छत पर पत्थर गिरना
घर में रखे हुए पैसे गायब होना
इस तरह के संकेतों से अंदाजा लगाया जा सकता है की घर पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है |जब ऐसा लगे की ऐसी कोई समस्या दिख रही है तो निम्न उपाय [उतारे] से लाभ हो सकता है |इस उतारे के लिए निम्न सामग्रियां लें –
तीन पीले नीम्बू बिना दाग के |तीन पीले बूंदी के लड्डू |तीन फूलदार लौंग |तीन गेंदा के पीले फूल |एक काली काजल की डिबिया |एक लाल लिपस्टिक |एक केले का पत्ता या धाक की पत्तल |एक निकिली कील |
सर्व प्रथम केले का पत्ता या पत्तल लें और उसे किसी चौकी पर बिछाकर एक पीले नीम्बू को पत्ते पर रखें |अब दूसरा निम्बू लें और उसको लिपस्टिक से लाल करले |अब तीसरे नीम्बू को काजल से काला कर लें औए केले के पत्ते पर रख दें |सभी निम्बुओं को लाइन से कर दें | अब पहले पीले निम्बू पर फिर लाल निम्बू पर फिर तीसरे काले निम्बू पर निकिली चीज से एक एक छिद्र कर लें और उनमे एक एक फूल वाली लौंग गाड़ दें |अब एक एक गेंदे के पीले फूल निम्बुओं पर चढ़ाएं |एक एक पीला बूंदी का लड्डू भी तीनो निम्बुओं पर चढ़ाएं |फिर सब चीजों को केले के पत्ते में लपेट लें |अब उतारे का सामान तैयार है |इसे लेकर घर के मुख्य द्वार पर पर जाकर इसे हाथ में लेकर मुख्या द्वार पर से ३१ बार उल्टा अर्थात एंटी क्लाक वाईज इसे उतारें और बोले-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी
एकमेव त्वया कार्यंम मस्मद्वैरी विनाशनम
मंत्र की शुद्धता के लिए दुर्गा सप्तशती में से देख लें |दुर्गा मंत्र का ३१ बार पाठ करें और उलटे क्रम से उतारा करते रहें |उतारा करने के बाद सभी उतारे की सामग्रियों को बहती हुई नदी या नाहर के किनारे रख आयें
घर से निकलते हुए समय से लेकर घर वापस आने तक मौन धारण रखे |घर वापस आने पर हाथ पैर मुंह धो लें और घर में घूनी करें |
सावधानी -क्रिया शुरू करने से पहले शरीर शुद्धि ,एवं शरीर बंधन अवश्य कर लें |या अपने गुरु का नाम लेकर कलाई पर धागा या रुमाल बाँध लें |केवल गुरुमुखी ही प्रयोग का इस्तेमाल करें |जो गुरु दीक्षित नहीं हैं इस प्रयोग को न करें |.

3……भूत-प्रेत ,वायव्य बाधाएं और तांत्रिक अभिचार
भूत-प्रेतों ,वायव्य बाधाओं और तांत्रिक अभिचार पर बहुत लोगों को विश्वास होता है बहुतों को नहीं ,जब तक व्यक्ति का अनहोनियों से सामना नहीं होता ,जब तक अनचाही-असामान्य घटनाएं नहीं होती ,अदृश्य शक्ति का अहसास नहीं होता व्यक्ति मानता नहीं की ऐसा कुछ होता है ,,समय अच्छा रहते ,सामान्य स्थिति में तार्किक बुद्धि विश्वास नहीं करती ,पर परेशान होता है तब ज्योतिषियों-तांत्रिको-पंडितों-साधकों-मंदिरों-मस्जिदों -मजारों पर दौड़ने लगता है ,,कभी हल मिलता है कभी नहीं ,इसके बहुत से कारण होते हैं .
भूत-प्रेत तब बनते हैं जब किसी व्यक्ति की असामान्य मृत्यु हो जाए और उसका शरीर अचानक काम करना बंद कर दे ,ऐसी स्थिति में उसकी कोशिकाओं की संरक्षित ऊर्जा से सम्बंधित विद्युत् ऊर्जा जो सूक्ष्म शरीर से जुडी होती है ,क्षरित नहीं हो पाती और सूक्ष्म शरीर के माध्यम से आत्मा को जोड़े रखती है ,आत्मा मुक्त नहीं हो पाती ,,व्यक्ति की ईच्छाएं ,आकांक्षाएं उसके मन में जीवित रहती हैं किन्तु उन्हें पूरा करने के लिए शरीर नहीं होता ,,ऐसी स्थिति में वे अपनी अतृप्त आकांक्षाएं पूरी करने के लिए अन्य व्यक्ति के शरीर को माध्यम बनाते हैं ,कभी यह सीधे किसी व्यक्ति के शरीर पर अधिकार कर लेते है ,कभी उन्हें डराकर उनमे प्रवेश कर जाते हैं ,,कभी-कभी ये सदैव साथ न रहकर अपनी आवश्यकतानुसार व्यक्ति के शरीर को प्रभावित करते हैं ,यह सब इनके शक्ति पर निर्भर करता है ,आवश्यक नहीं की कमजोर ही इनके शिकार हों किन्तु अक्सर बच्चे-महिलायें-नव विवाहिताएं-गर्भावस्था वाली महिलायें-सुन्दर कन्याएं-कमजोर मनोबल वाले पुरुष-ठंडी प्रकृति के व्यक्ति इनके आसान शिकार होते हैं ,यद्यपि यह किसी को भी प्रभावित कर सकते है अगर शक्तिशाली हैं तो ,चाहे परोक्ष करें या अपरोक्ष ,,
इनकी कई श्रेणियां होती है ,जो इनके शक्ति के अनुसार होती है ,,भूत-चुड़ैल कम शक्ति रखते हैं ,प्रेत उनसे अधिक शक्ति रखते हैं ,बीर-शहीद आदि प्रेतों से भी शक्तिशाली होते हैं ,जिन्न-ब्रह्म राक्षस इनसे भी अधिक शक्तिशाली होते हैं, डाकिनी-शाकिनी-पिशाच-भैरव आदि और शक्तिशाली नकारात्मक शक्तियां हैं ,
,, जिन स्थानों पर पहले कभी बहुत मारकाट हुई हो ,युद्ध हुए हों वहां इनकी संख्या अधिक होती है ,अपने मरने के स्थान से भी इनका लगाव होता है यद्यपि ये कहीं भी आ जा सकते हैं ,श्मशानों -कब्रिस्तानों आदि अंत्येष्टि के स्थानों पर ये अधिकता में पाए जाते है ,,ऐसी जगहों जहां अन्धेरा रहता हो ,नकारात्मक ऊर्जा हो ,गन्दगी हो ,सीलन हो ,प्रकाश की पहुँच न हो वहां और कुछ वृक्षों -वनस्पतियों के पास इन्हें शांति मिलती है और इन्हें अच्छा लगता है अतः ये वहां रहना पसंद करते है ,यद्यपि कुछ शक्तिशाली आत्माएं मंदिरों -मजारों-मस्जिदों तक में जा सकती है ,राजधानियों में ,खँडहर महलों में,पहले के युद्ध मैदानों के आसपास ,सडकों के आसपास के वृक्षों पर ,चौराहों आदि पर जहां अधिक दुर्घटनाएं हुई हों ये अधिकता में पाए जाते हैं |
इनकी शक्ति रात्री में बढ़ जाती है क्योकि इन्हें वातावरण की रिनात्मक ऊर्जा से सहारा मिलता है और इनके नकारात्मकता की क्षति नहीं होती ,अँधेरी रातों में ,गर्मी की दोपहर में यह अधिक क्रियाशील होते हैं ,यद्यपि यह चांदनी रातों में और दिन में भी क्रियाशील हो सकते हैं ,कुछ शक्तिया पूर्णिमा के चन्द्रमा का सहारा लेकर भी कुछ लोगों को अधिक परेशान करती है ,क्योकि पूर्णिमा -अमावस्या को कुछ लोगों को मानसिक तनाव -डिप्रेसन की परेशानी होती है ,ऐसे में यह उन्हें अधिक परेशां करते हैं |
कुछ लोग दुर्भावनावश अथवा दुश्मनी में कुछ लोगों पर तांत्रिक टोटके कर देते हैं या तांत्रिक की सहायता से अभिचार करवा देते हैं ,कभी कभी तांत्रिक इन अभिचारों के साथ आत्माएं भी संयुक्त कर भेज देते हैं ,यद्यपि यह प्रक्रिया सामान्य भूत-प्रेतों के प्रभाव से भिन्न होती है किन्तु यह अधिक परेशान करती है ,और इसका इलाज तांत्रिक ही कर सकता है ,इलाज में भी परस्पर शक्ति संतुलन प्रभावी होता है ,,टोटकों और अभिचारों का उर्जा विज्ञान भिन्न होता है जो वस्तुगत ऊर्जा और अभिचार करने वाले के मानसिक बल पर निर्भर करता है ,इनमे दिन-समय-मुहूर्त-स्थान-वस्तु -सामग्री-पद्धति का विशिष्ट संयोग और शक्ति होता है |यह क्रिया किसी भी रूप में व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है ,मानसिक तनाव ,उन्नति में अवरोध,व्यापार में नुक्सान ,दूकान बंधना ,कार्य क्षेत्र में तनाव ,मन न लगना ,दुर्घटनाएं,मानसिक विचलन-डिप्रेसन,अशुभ शकुन,अनिद्रा ,पतन ,दुर्व्यसन,निर्णय में गलतियां ,कलह,मारपीट आपस में ,मतभिन्नता आदि इसके कारण से उत्पन्न हो सकते हैं .|

4……भूत-प्रेत ,वायव्य बाधा और तांत्रिक अभिचार से मुक्ति के उपाय
भूत-प्रेत-चुड़ैल जैसी समस्याओं से व्यक्ति अथवा परिवार के सहयोग से मुक्ति पायी जा सकती है ,किन्तु उच्च स्तर की शक्तियां सक्षम व्यक्ति ही हटा सकता है ,कुछ शक्तियां ऐसी होती हैं की अच्छे अच्छे साधक के छक्के छुडा देती हैं और उनके तक के लिए जान के खतरे बन जाती है ,ऐसे में केवल श्मशान साधक अथवा बेहद उच्च स्तर का साधक ही उन्हें हटा या मना सकता है ,किन्तु यहाँ समस्या यह आती है की इस स्तर का साधक सब जगह मिलता नहीं ,उसे सांसारिक लोगों से मतलब नहीं होता या सांसारिक कार्यों में रूचि नहीं होती ,पैसे आदि का उसके लिए महत्व नहीं होता या यदि वह सात्विक है तो इन आत्माओं के चक्कर में पना नहीं चाहता ,क्योकि इसमें उसकी उस शक्ति का खर्च होता है जो वह अपनी मुक्ति के लिए अर्जन कर रहा होता है .
भूत-प्रेत चुड़ैल जैसी समस्याओं को कौवा तंत्र के प्रयोग से हटाया जा सकता है किन्तु यह जानकार साधक ही कर सकता है ,प्रेत अथवा पिशाच-पिशाचिनी साधक भी इन्हें हटा सकता है ,अच्छा तांत्रिक भी इन्हें हटा सकता है ,देवी साधक,हनुमान-भैरव साधक इन्हें हटा सकता है ,किन्तु उच्च शक्तिया केवल उच्च साधक ही हटा सकता है,इन्हें देवी[दुर्गा-काली-बगला आदि महाविद्या ]साधक ,भैरव-हनुमान साधक ,श्मशान साधक ,अघोर साधक ,रूद्र साधक हटा सकता है , .
कुछ क्रियाएं इन समस्याओं पर अंकुश लगाती हैं ,पर यहाँ भी योग्य का मार्गदर्शन आवश्यक होता है ,फिर भी प्रसंगवश कुछ क्रियाएं निम्न हैं [१]भूत-प्रेत ग्रस्त व्यक्ति को हरसिंगार की जड़ के साथ घोड़े की नाल धारण कराने से लाभ होता है .[२]भूत ग्रस्त व्यक्ति के सामने उल्लू का मांस जलाने से उसे राहत मिलती है .[३]नागदमन के पत्ते के साथ सियार के बाल को टोना टोटका ग्रस्त व्यक्ति के ऊपर से उतार कर अग्नि में डालने से उसे लाभ होता है .[४]नागदमन और अपामार्ग की जड़ को धारण करने से बाधा में लाभ होता है .[५]रविपुष्य में निकली और अभिमंत्रित श्वेतार्क की जड़ धारण करने से भूत-प्रेत बाधा दूर होती है .[६]भूत-प्रेत ग्रस्त व्यक्ति के सामने गुडमार के सूखे पत्तों की धूनी जलाने से उसे लाभ होता है .[७]कटहल की ज धारण करने से टोन से बचाव होता है .[८]महानिम्ब की जड़ धारण करने से भूत-प्रेत से सुरक्षा होती है .[९]गरुड़ वृक्ष के ९ इंच के बराबर की लकड़ी को ९ बराबर हिस्सों में काटकर ९ सूअर के अंत के साथ अलग अलग घर के चारो और जमीन में ठोंक देने से घर में भूतों का उपद्रव शांत हो जाता है .[१०]मंत्र सिद्ध सूअर दांत को व्यक्ति के पुराने कपडे में लपेटकर बहते पानी में छोड़ देने से भूत-प्रेत की पीड़ा शांत होती है .[११]भालू के बालों की धूनी देने से भूत-प्रेत दूर होते हैं .[१२]टिटहरी के पंख को बढ़ा ग्रस्त व्यक्ति पर से उतारकर जलाने से भूत-प्रेत से राहत मिलती है .[१३]दक्षिणमुखी हनुमान जी के दाहिने पैर पर लगे सिन्दूर के तिलक से भूत-प्रेत बाधा में राहत मिलती है .[१४]तुलसी-कालीमिर्च-सहदेई की जड़ धारण करने से भूत बाधा में राहत मिलती है .[१५]सफ़ेद घुंघुची की जड़ या काले धतूरे की जड़ धारण कराने से ऐसी पीड़ा दूर होती है .,,उपरोक्त प्रयोगों के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के प्रयोग और उतारे होते हैं जिनसे ऐसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है ,साधक मंत्र और तंत्र प्रयोग से ऐसे समस्याओं से मुक्ति दिलाते है .
बजरंग बाण का पाठ ,सुदर्शन कवच ,दुर्गा कवच,काली सहस्त्रनाम ,बगला सहस्त्रनाम ,काली कवच, बगला कवच, आदि के पाठ से इनके प्रभाव पर अंकुश लगता है ,उग्र शक्तियों की आराधना इनके प्रभाव को रोकती है ,बगला अनुष्ठान ,शतचंडी यज्ञ ,काली अनुष्ठान ,बगला प्रत्यंगिरा ,काली प्रत्यंगिरा,गायत्री हवन ,महामृत्युंजय हवन से इनसे मुक्ति पायी जा सकती है ,सिद्ध साधक द्वारा बनाई यन्त्र -ताबीज आदि से इनके प्रभाव को रोका भी जा सकता है और मुक्ति भी पायी जा सकती है ,यद्यपि अनेक प्रकार के टोटके इन शक्तियों पर उपयोग किये जाते हैं पर यह कम शक्तिशाली प्रभावों पर ही अधिक प्रभावी होते हैं ,उच्च शक्तियों पर इनका बहुत प्रभाव नहीं पड़ता कुछ अंकुश अवश्य हो सकता है ,कभी-कभी कुछ छोटे टोटके जिनका इन पर बहुत प्रभाव न पड़े इन्हें और अधिक उग्र भी कर देते है अतः सावधानी और उपयुक्त मार्गदर्शन आवश्यक होता है ,
सबसे बेहतर तो यही होता है की यदि इस प्रकार की कोई समस्या हो तो किसी अच्छे जानकार व्यक्ति को दिखाया जाए ,किन्तु यदि कोई बेहतर जानकार न मिले या आसपास न हो अथवा आसपास के कम जानकारों से न लाभ मिल पा रहा हो तो ,किसी उच्च स्तर के साधक से संपर्क करना चाहिए ,यदि वह पीड़ित तक न जाए तो पीड़ित को वहां ले जाएँ ,यह भी न हो सके तो साधक से यन्त्र- ताबीज बनवाकर पीड़ित को धारण करवाए ,,यदि पीड़ित करने वाली शक्ति कम शक्तिशाली होगी तो तुरंत हट जायेगी नहीं तो उसके प्रभाव में कमी तो आ ही जायेगी ,उसे व्यक्ति को प्रभावित करने में तो दिक्कत आएगी ही ,,यंत्रो-ताबीजो से निकलने वाली तरंगे और सकारात्मक ऊर्जा से उस नकारात्मक शक्ति को कष्ट होता है ,कभी कभी यह ताबीज उतारने या हटवाने का भी प्रयास करते हैं ,,उः क्रिया उसी प्रकार की है की जैसे किसी व्यक्ति का भोजन बंद कर दिया जाए तो वह कितने दिन तक जीवित रहेगा ,उसी प्रकार अतृप्त आत्मा या अभिचार जिस उद्देश्य से आया है यदि उसमे रुकावट उत्पन्न कर दिया जाए तो वह कब तक रुका रहेगा ,इस प्रकार धीरे-धीरे व्यक्ति को राहत मिल जाती है ,साथ में अगर जानकार के बताये टोटके भी किये जाए और उपाय अपनाए जाए तो जल्दी राहत मिल सकती है ,इस प्रकार उच्च शक्तियों को भी रोका जा सकता है ,हां यन्त्र की शक्ति भी उसी अनुपात में होनी चाहिए की वह उसके प्रभाव को रोक सके ,,बगलामुखी यन्त्र ,काली यन्त्र ,छिन्नमस्ता यन्त्र ,धूमावती यन्त्र ,तारा यन्त्र ,हनुमान यन्त्र ,भैरव यन्त्र ,दुर्गा यन्त्र आदि इस श्रेणी में आते हैं की किसी भी शक्ति के प्रभाव को रोक सकते हैं बशर्ते की यह उनके सिद्ध साधक द्वारा निर्मित हों

5……आप पर या घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो सकता है
प्रकृति में सकारात्मक ऊर्जा या शक्ति हमारे लिए लाभदायक और नकारात्मक उर्जा या शक्तिया नुक्सान करने वाली या परेशानी उत्पन्न करने वाली होती है ,,,यह समस्त प्रकृति दो प्रकार की शक्तियों या उर्जाओं से बनता है ,धनात्मक और रिनात्मक ,सूर्य और अपनी ऊर्जा से प्रकाशित ग्रह -नक्षत्रों से उत्पन्न होने वाली या प्राप्त होने वाली ऊर्जा धनात्मक मानी जाती है ,जबकि पृथ्वी और ग्रहों से उत्पन्न ऊर्जा या शक्ति प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में रिनात्मक होती है ,,यह दोनों ही उर्जाये हमारे लिए सकारात्मक ही होती हैं ,इन दोनों के संतुलन और प्राप्ति से ही समस्त प्राणी और जीव -वनस्पतियों की उत्पत्ति और स्थिति होती है ,,,इन प्राकृतिक शक्तियों के अतिरिक्त दो अन्य पारलौकिक शक्तिया व्यक्तियों को प्रभावित करती है ,सकारात्मक और नकारात्मक ,,सकारात्मक वह है जिनकी शक्ति आपके लिए लाभदायक है जैसे आपके ईष्ट ,आपके कुल देवता ,महाविद्यायें,देवी-देवता आदि और नकारात्मक वह है जो आपके लिए समस्या ही उत्पन्न करते है जैसे भूत-प्रेत-पिशाच-ब्रह्म राक्षस-जिन्न-शाकिनी-डाकिनी आदि ,
आज के समय में नकारात्मक ऊर्जा शक्तियों का प्रभाव सामान्यतया घरों परिवारों पर बहुत दिखने लगा है ,जबकि उन्हें पता ही नहीं होता की वे इनसे प्रभावित है ,उनके द्वारा बताये जाने वालो लक्षणों से प्रथम दृष्टया अकसर इनकी समस्या घरों में मिलती है ,इनके कारण वास्तु दोष ,घरों में सूर्य के प्रकाश की कमी ,गलत जगह गलत हिस्सों का बना होना ,पित्र दोष ,कुल देवता का दोष ,ईष्ट प्रबलता की कमी ,रहन-सहन की स्थिति ,विजातीयता ,धार्मिक श्रद्धा की कमी ,खुद की गलतियाँ ,प्रतिद्वंदिता ,अभिचार आदि हो सकते हैं ,
यदि घर से बाहर से घर पहुचने पर सर भारी हो जाए ,घर में अशांति का वातावरण हो ,कलह होता हो,पति-पत्नी में अनावश्यक अत्यधिक कलह हो ,पूजा-पाठ में मन न लगे ,पूजा पाठ से सदैव मन भागे ,पूजा पाठ करते समय सर भारी हो,लगे कोई आसपास है ,जम्हाई अधिक आये ,पूजा पाठ करने से दुर्घटनाएं या परेशानियां बढ़ जाएँ ,पूजा पाठ आदि धार्मिक क्रियाओं में अवरोध उत्पन्न हो ,बीमारियाँ अधिक होती हों ,आय-व्यय का संतुलन बिगड़ा हो ,आकस्मिक दुर्घटनाएं अधिक होती हों ,रोग हो किन्तु कारण पता न चले ,सदस्यों में मतभेद रहते हों ,मन हमेशा अशांत रहता हो ,खुशहाली न दिखे ,प्रगति रुकी लगे अथवा अवनति होने लगे ,संताने विरुद्ध जाने लगें ,संतान बिगड़ने लगे ,उनके भविष्य असुरक्षित होने लगे ,संतान हीनता की स्थिति हो ,अधिक त्वचा रोग आदि हों ,अपने ही घर में भय लगे ,लगे कोई और है आसपास ,अपशकुन हो ,अनावश्यक आग आदि लगे ,मांगलिक कार्यों में अवरोध उत्पन्न हो तो समझना चाहिए की घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश है, इस स्थिति में इनका पता लगाने का प्रयास करके इन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए |
जब आपके कुल देवता /देवी को ठीक से पूजा न मिले तो वे नाराज हो सकते हैं अथवा निर्लिप्त हो सकते हैं ,कमजोर भी हो सकते हैं ,ऐसे में नकारात्मक ऊर्जा को रोकने वाली मुख्य शक्ति हट जाती है और वह परिवार पर प्रभावी हो सकती है,कभी कभी कुलदेवता की नाराजगी या निर्लिप्तता से या नकारात्मक ऊर्जा अधिक प्रबल होने से वह कुलदेवता या ईष्ट को दी जाने वाली पूजा खुद लेने लगती है जिससे उसकी शक्ति बढने लगती है और कुलदेवता/देवी कमजोर या रुष्ट होते जाते हैं और ईष्ट को भी पूजा नहीं मिलती है ,आपके ईष्ट कमजोर हों या कोई ईष्ट ही न हों या आप पूजा पाठ ठीक से न करते हों तो भी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव घर में हो सकता है ,,किसी से दुश्मनी हो तो वह भी आभिचारिक क्रिया करके किसी नकारात्मक ऊर्जा को आप पर भेज सकता है ,,आपके घर में पित्र दोष है तो पितरों के साथ अन्य शक्तियां भी जुड़ जाती हैं जिन्हें आपके परिवार से कोई लगाव नहीं होता है ,पित्र भले नुक्सान कभी कभी न करें किन्तु साथ जुडी शक्तिया अवश्य अपनी अतृप्त इच्छाएं आपके परिवार या आप से पूर्ण करने का प्रयास करती हैं ,,ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष तो लगता है की ४ लोग घर में हैं किन्तु खर्च १० लोगों के बराबर होता है और कोई न कोई समस्या उत्पन्न होती ही रहती है ,कभी कभी कोई नकारात्मक शक्ति किसी पर आधिपत्य करके अपने को देवी या देवता बताती है और पूजा प्राप्त करने लगती है जिससे उसकी शक्ति तो बढती ही है उसके निकाले जाने की भी संभावना कम हो जाती है ,,घर में अन्धेरा हो तो भी नकारात्मक शक्तिया घर में स्थान बना लेती हैं क्योकि ऐसी जगहों पर उन्हें अच्छा लगता है रहना ,फलतः वे वहां रहने वालों के लिए समस्या उत्पन्न करते हैं ,,कभी कभी कोई नकारात्मक ऊर्जा आशक्तिवश भी किसी के पीछे लग जाती है और उससे अपनी अतृप्त वासनाएं पूर्ण करने का प्रयास करती है ,,कभी कभी किसी जमीन में नकारात्मक उर्जाओं का स्रोत होता है और उस पर मकान बना लेने पर वह वहां रहने वालों को परेशान करती है ,,कभी कभी बहुत अधिक दुर्घटनाएं अथवा हत्याएं भी किसी घर को इनका डेरा बना देते हैं ,
यदि व्यक्ति को लगे की उसके घर में या उस पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है तो उसे किसी योग्य जानकार व्यक्ति ,सिद्ध व्यक्ति या उच्च स्तर के तांत्रिक से मिलना चाहिए ,,इनसे मुक्ति का उपाय करना चाहिए ,पित्र दोष ,कुल देवत/देवी दोष ,ईष्ट दोष ,गृह दोष का उपचार करना चाहिए ..

6……कैसे हटाये नकारात्मक उर्जा घर-परिवार-व्यक्ति पर से
आपके घर में ,आप पर ,परिवार पर नकारात्मक उर्जा अर्थात नुक्सान और क्षति देने वाली ऊर्जा का प्रभाव हो तो उन्हें अपने अन्दर ,परिवार में ,घर में सकारात्मक ऊर्जा बढाकर हटाया जा सकता है ,,नकारात्मक ऊर्जा घर के अँधेरे हिस्सों में हो सकती है,व्यक्ति पर हो सकती है ,परिवार पर हो सकती है ,पित्रदोष ,कुलदेवता/देवी दोष ,स्थान दोष [भूमि में दबी,श्मशानिक क्षेत्र ,बड़े वृक्षीय क्षेत्र ],क्षेत्र दोष ,वास्तुदोष ,अभिचार कर्म ,हत्या आदि के कारन हो सकती है ,खुद आकर्षित होकर आई हो सकती है ,अक्सर इनका पता नहीं चलता ,पर इनके प्रभाव से उन्नति रूकती है ,तनाव-क्लेश होता है ,आया-व्यय की असमानता उत्पन्न होती है ,बचत संभव नहीं होता क्योकि ये किसी न किसी प्रकार असंतुलन उत्पन्न करते रहते हैं और अपना हिस्सा लेते रहते हैं ,रोग-व्याधि बढाते हैं ,दुर्घटनाये देते हैं,मांगलिक कार्यों ,पूजा पाठ में अवरोध आता है ,कोई काम ठीक से सफल नहीं होता ,परिवार में मतभेद -उत्पात रहता है ,संताने बिगड़ने लगती हैं ,भाग्य कुछ और कहता है और होता कुछ और है ,अक्सर यह इतनी धीमी तरीके से अथवा इस प्रकार से होता है की व्यक्ति को कारण समझ में नहीं आता और वह भाग्य का दोष समझता रहता है ,वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा देखता रहता है ,,किन्तु जब इनका प्रभाव समाप्त होता है तेजी से उन्नति-खुशहाली आती है तब उसे समझ में आता है की काश पहले ही हम यह सब कर देते |नकारात्मक ऊर्जा हटाने के लिए और सकारात्मक ऊर्जा वृद्धि के लिए निम्न बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए |
[१] नकारात्मक ऊर्जा हटाने के लिए सर्वप्रथम वास्तुदोष पर ध्यान देकर उसके उपचार का उपाय कर घर में धनात्मक ऊर्जा बढ़ानी चाहिए ,इससे किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को घर में दिक्कत होने लगती है और उसका बल कम होता है ,,आपके घर के आसपास या ऊपर किसी बड़े वृक्ष की छाया से भी नकारात्मक ऊर्जा की वृद्दि हो सकती है ,इस प्रकार की शक्तियों को कुछ वृक्षों के पास शांति मिलती है अतः ये वहां रहना पसंद करती है और मनुष्यों को वहां से हटाने का प्रयास कर सकती है ,वास्तु दोष आदि के लिए वास्तु पूजा ,कुछ अभिमंत्रित वस्तुओ को दबाना ,फेंगसुई की वस्तुओं का प्रयोग ,भारतीय वास्तु निदान प्रयोग लाभप्रद होते है ,कभी कभी विशिष्ट समयों पर हवन आदि करते रहने से सकारात्मकता बढती है |मकान आदि से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए सूर्य का सुबह का प्रकास कमरों में पहुचना लाभदायक होता है ,ऐसी व्यवस्था की जाए की हर कमरे में प्रकाश की प्राकृतिक व्यवस्था हो और हवा आदि आ जा सके तो नकारात्मक ऊर्जा अपने आप कम हो जाती है |
[२] कुलदेवता /देवी की पूजा यथोचित विधि से और यथोचित समय पर हो रही है की नहीं यह देखना चाहिए ,उनका पता न हो तो पता लगाने का प्रयास करना चाहिए ,,न पता लगे तो घर में शिव परिवार की पूजा में वृद्धि कर देनी चाहिए ,क्योकि ९९ %कुलदेवी/कुलदेवता किसी न किसी रूप से शिव परिवार से जुड़े होते हैं या इनके रूप होते है ,शिव परिवार से सम्बंधित देवी-देवता पृथ्वी और प्रकृति की मूल ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते है और उत्पत्ति-संहार -सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होते हैं ,अतः इनकी आराधना सभी कुलदेवता/देवी की अपूर्णता पूर्ण कर देती है ,,इस हेतु विशिष्ट सिद्ध साधक से अभिमंत्रित यन्त्र ,मूर्ति अथवा शिवलिंग आदि ले कर स्थापित किये जा सकते है ,अथवा धारण किये जा सकते हैं ..काली -महाविद्या-दुर्गा-गणेश-शिव की विशिष्ट पूजा सभी प्रकार से सुरक्षा प्रदान करती है |
[३] तीसरे बिंदु पर ध्यान देना चाहिए की घर में पित्र दोष तो नहीं है ,पित्र दोष होने पर अपने कुछ पित्र जो अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए हों वे अपनी इच्छाओं की पूर्ति भी परिवार से चाहते हैं ,सामान्य मृत्यु वाले भी परिवार के प्रति दृष्टि रखते हैं और उन्हें उचित सम्मान न मिलने ,उन्हें याद न करने ,संस्कारों के विरुद्ध कार्य करने से वे भी बाधाएं उत्पन्न करते हैं ,,सबसे बड़ी समस्या इनके साथ जुड़ने वाली दूसरी शक्तियां उत्पन्न करती हैं ,जिन्हें इस परिवार से कोई लगाव नहीं होता क्योकि ये दुसरे परिवारों से सम्बंधित होती हैं और मित्रता वश इस परिवार के पितरों से जुडी होती हैं ,क्योकि इन्हें इस परिवार से लगाव नहीं होता अतः अपनी सभी अतृप्त इच्छाएं ये इस परिवार से पूर्ण करने का प्रयास करते हैं ,और सीधे परिवार और घर को प्रभावित करते हैं ,चुकी इस परिवार के पित्र खुद असंतुष्ट होते हैं अतः उन्हें ये नहीं रोकते ,,अतः पित्र दोष न रहे यह सदैव ध्यान रखना चाहिए |
[४] .नकारात्मक ऊर्जा आपके साथ कभी आपकी गलती से भी लग सकती है ,राह चलते किसी का उतारा हुआ है और आप प्रथमतः उसे लांघ देते हैं तो यह आपके साथ लग सकती है ,ऐसे उतारे या विशिष्ट स्थान-चौराहे आदि पर राखी गयी पूजन सामग्री ,फूल-माला-सिन्दूर-नीबू-अंडा-पिन आदि को छेड़ देने पर भी प्रभावित रहने की सम्भावना रहती है ,कभी भूलवश किसी मजार-कब्र ,समाधि ,चौरा ,पीठ आदि पर थूक देने या मूत्र त्याद आदि आसपास कर देने पर भी उससे सम्बंधित शक्ति रुष्ट हो आपके साथ लग सकती है और परेशान कर सकती है |अतः ऐसे स्थानों पर सावधानी बरतनी चाहिए और ऐसी समस्या के लिए अच्छे जानकार से सलाह लेनी चाहिए और निराकरण का उपाय करना चाहिए |इनसे बचने के लिए उग्र शक्ति की ताबीज-यन्त्र बहुत मददगार होता है जिसके प्रभाव से सामान्यरूप से ऐसी शक्तिया प्रभावित नहीं कर पाती ..
[५] कभी नकारात्मक ऊर्जा किसी की सुन्दरता ,बलिष्ठता से भी आकृष्ट हो सकती है ,अथवा अपनी अतृप्त ईच्चायें पूर्ति के लिए भी व्यक्ति को निशाना बना सकती हैं ,अक्सर ऐसे मामलों में कुवारी अथवा नवविवाहिता महिलायें,बच्चे शिकार होते हैं ,यह नकारात्मक शक्तियां अधिकतर आत्माएं होती है जो अपनी अतृप्त इच्छाएं पूर्ण करने हेतु इन्हें शिकार बनाती हैं,कभी कभी यह बेहद शक्तिशाली भी होते हैं ,इसके उपचार के लिए अच्छे तांत्रिक की आवश्यकता होती है ,उग्र देवियों /शक्तियों के यन्त्र-ताबीज-पूजा से इन्हें हटाया जा सकता है |इन्हें गले-कमर-बाह में काले धागे,जड़े,ताबीज आदि धारण करने से इनसे बचाव होता है |
[६] दुश्मन अथवा विरोधी भी तांत्रिकों आदि की सहायता से या स्वयं आभिचारिक टोटके और तंत्र क्रिया से अपने विरोधी पक्ष को परेशांन करते है और काफी क्षति कर सकते है ,यह आभिचारिक क्रियाएं वातावरण की अदृश्य नकारात्मक ऊर्जा को व्यक्ति पर प्रक्षेपित कर देती है ,इनमे कभी कभी आत्माओं को भी भेजा जाता है ,यद्यपि यह जरुरी नहीं होता ,पर यदि आत्मा ऐसी क्रिया से जुडी होती है तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है क्योकि यह आत्मा बंधी होती है और खुद नहीं जा सकती जब तक की सम्बंधित तांत्रिक न चाहे ,यहाँ बेहद उच्च स्तर का साधक ही विरोधी तांत्रिक की क्रिया को काट कर यह समाप्त कर सकता है |सामान्य तांत्रिक अभिचार को घर में अभिमंत्रित जल छिडकने ,कवच आदि का पाठ करने ,गायत्री -काली -दुर्गा आदि के हवंन से रोका अथवा हटाया जा सकता है ,हवन-जल छिडकाव से सकारात्मक उर्जा प्रवाह बढ़ता है और इनका प्रभाव कम होता है |
[७] कभी कभी किसी जमीन में हड्डी-राख-कब्र-समाधि आदि दबी होती है और जानकारी के अभाव में व्यक्ति वहां मकान बनवा लेता है ,तब भी उस घर में नकारात्मक ऊर्जा की समस्या आ सकती है ,कभी के नदी-तालाब-कुआ-श्मशान के हिस्सा रहे भूमि में भी कुछ भी दबा हो सकता है जो घर में रहने वालो को प्रभावित करता है और रोग-शोक-विवाद-कलह-उत्पात-अशांति-उन्नति में अवरोध -दुर्घटनाओं के लिए उत्तरदाई हो सकता है ,ऐसे में जमीन लेने पर उसकी जांच करनी चाहिए ,बाद में समस्या लगने पर अच्छे जानकार की मदद लेनी चाहिए ,तंत्र में इसके इलाज हैं ,उस मकान में ५ लाख महामृत्युंजय अथवा शतचंडी अथवा बगलामुखी अनुष्ठान करवाकर इन्हें रोका और मकान को शुद्ध किया जा सकता है ,जमीन में अभिमंत्रित पलास की कीले ,मकान में अभिमंत्रित कीले ठोककर सुरक्षित किया जा सकता है और सकारात्मक ऊर्जा बढाई जा सकती है |कोसिस करनी चाहिए की ऐसे मकानों में अन्धेरा हिस्सा न रहे ,दिन का प्रकाश हर हिस्से तक पहुचे .
उपरोक्त तथ्यों पर ध्यान देते हुए व्यवस्था करने पर नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित किया जा सकता है फिर भी यदि इनका प्रभाव आ ही जाए तो घर-परिवार -व्यक्ति पर से नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हटाने के लिए सकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ाना चाहिए, अच्छे जानकार की मदद लेनी चाहिए ,कोई भी दैवीय शक्ति जो मांगलिक हो उसका प्रभाव बढ़ाने से इन नकारात्मक शक्तियों की ऊर्जा का क्षरण होता है और इन्हें कष्ट होता है अतः ये पलायन करने लगते हैं ,उग्र और मांगलिक दैवीय शक्तियां यहाँ अधिक लाभदायक होते हैं यथा दुर्गा-काली-बगलामुखी-हनुमान आदि ,इनके पूजा-अनुष्ठान-यन्त्र प्रयोग-हवन आदि से नकारात्मक शक्तिया शीघ्र हटती हैं ..

7…..तंत्र दोधारी तलवार होता है जो चूक होने पर खुद का भी नुक्सान कर सकता है ,इसीतरह हर प्रक्रिया के सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों होते हैं ,जैसे वशीकरण से किसी बिगड़े को वश में कर अपने अनुकूल कर पारिवारिक शांति भी लाइ जा सकती है और किसी दुसरे को वश में कर गलत कार्य भी किया जा सकता है ,,इसीतरह उच्चाटन से किसी को किसी से दूर कर घर में शांति भी लाइ जा सकती है ,गलत होने से रोका भी जा सकता है ,ग्रह बाधा -रोग-वायव्य बाधा दूर भी किया जा सकता है और किसी का घर भी तोड़ा जा सकता है ,कहीं से हटाया भी जा सकता है ,,विद्वेषण से दुश्मनों में फूट भी डाली जा सकती है और किन्ही एक ही परिवार में दुश्मनी भी करवाई जा सकती है ,,इस प्रकार तंत्र के दुरुपयोग भी हो सकते है, इस लिए भी जब तक साधक या जानकार संपर्क करने वाले व्यक्ति को जान समझ नहीं लेता सही प्रक्रिया ,मंत्र आदि नहीं बताता ,न खुद करता है ,यद्यपि यहाँ अपवाद भी कुछ तांत्रिक होते हैं जो कुछ पैसों के लालच में किसी का बिना सोचे समझे अहित भी कर देते हैं ,,,कभी कभी ऐसी भी स्थितियां आती हैं की कोई आकर झूठ बोलता है की किसी के द्वारा उसे परेशानी है और जानकार उसे सही मान प्रक्रिया बता देता है और वह व्यक्ति उसका दुरुपयोग कर देता है ,,,पर सामान्यतया जानकार सोच समझकर ही निर्णय करता है और बिना जाने पूर्ण प्रक्रिया से अवगत नहीं कराता किसी को ,,
किसी को कोई समस्या अगर हो तो उसे कहीं से देखकर कोई उपाय करने की बजाय किसी योग्य जानकार से संपर्क करना चाहिए और व्यक्तिगत रूप से अपनी समस्या व्यक्त कर उपाय पूछना चाहिए या करवाना चाहिए ,क्योकि अक्सर यहाँ वहां लिखे उपाय अधूरे हो सकते हैं ,मंत्र गलत हो सकते हैं ,सामग्री अशुद्ध हो सकती है ,प्रक्रिया ऊपर नीचे हो सकती है ,अधूरी अथवा अशुद्ध लिखी किसी पुस्तक का अंश लिखा हो सकता है ,जिससे लाभ की बजाय हानि भी हो सकती है ,,, यही हाल साधना का हो सकता है ,आई हुई ऊर्जा न सँभलने के कारण अनियंत्रित हो नुकसान भी पंहुचा सकती है ,फेसबुक जैसे माध्यमों पर तंत्र-ज्योतिष-गुप्त विद्याओं-अध्यात्म-योग आदि के पोस्टों की बाढ़ आई हुई है जिनमे से अधिकतर पुस्तकों से लेकर लिखी गयी होती हैं ,इनमे कितने अनुभूत है नहीं कहा जा सकता ,कितनी प्रक्रिया ,मंत्र आदि सही हैं नहीं कहा जा सकता है ,अतः हर स्तर पर सावधानी आवश्यक होती है ,,,
सामान्यतया समझदार और योग्य साधक जिसने खुद क्रियाएं की हों वह सम्पूर्ण प्रक्रिया नहीं देता वह उनके सिद्धांत -कार्यप्रणाली -वैज्ञानिकता आदि व्यक्त कर देता है पर मूल क्रिया व्यक्त नहीं करता ,क्योकि वह उनके महत्व को समझता है ,अतः जब भी समस्या हो तो खूब सोच समझकर ,विचार विमर्श करके ,जानकार व्यक्ति के परामर्श से ही कोई क्रिया करनी अथवा करवानी चाहिए ,,तंत्र में सभी समस्याओं के समाधान हैं ,इसकी शक्ति अद्वितीय -अलौकिक है क्योकि इसकी शक्तिया ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्तियां हैं ,पर यह हर कदम पर सावधानी भी मांगता है ,अधिक लाभदायक का उल्टा अधिक नुकसानदायक भी होता है ,,,यह ऊर्जा उत्पन्न कर उसे नियंत्रित कर लाभ हेतु उपयोग करने का मार्ग है ,नियंत्रित करना नहीं आया और उर्जा उत्पन्न कर लिया तो क्षति भी संभव है ,नियंत्रित करके दिशा दे दी तो निर्माण भी संभव है ,हर क्रिया की प्रतिक्रया भी होती है अतः क्रिया के पहले प्रतिक्रया पर भी ध्यान होना चाहिए ,,,किसी द्वारा कोई क्रिया करवाई या खुद की जाए तो यह भी हमेशा ध्यान होना चाहिए की यदि यह क्रिया वापस लौट आई तो क्या हम उसे संभाल पायेंगे ,,कभी ऐसा भी होता है की कोई क्रिया आपने की या करवाई किसी तांत्रिक से वह क्रिया वहां से वापस लौटा दी गयी जहाँ के लिए क्रिया की गयी थी ,उस समय वापस आई क्रिया की शक्ति दोगुनी होती है ,ऐसे में अगर क्रिया करने वाले तांत्रिक के पास शक्ति है तो वह तो नुक्सान नहीं उठाएगा ,किन्तु आपका नुक्सान हो सकता है ,अतः जब भी कुछ करें बनाने के लिए, शांति -संमृद्धि के लिए करें ,किसी को परेशां करने के लिए नहीं ,और खुद कुछ करने की अपेक्षा योग्य जानकार की मदद ले ,यदि आप तंत्र को ठीक से नहीं जानते हैं तो …….

8……आप पर या घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हो सकता है
प्रकृति में सकारात्मक ऊर्जा या शक्ति हमारे लिए लाभदायक और नकारात्मक उर्जा या शक्तिया नुक्सान करने वाली या परेशानी उत्पन्न करने वाली होती है ,,,यह समस्त प्रकृति दो प्रकार की शक्तियों या उर्जाओं से बनता है ,धनात्मक और रिनात्मक ,सूर्य और अपनी ऊर्जा से प्रकाशित ग्रह -नक्षत्रों से उत्पन्न होने वाली या प्राप्त होने वाली ऊर्जा धनात्मक मानी जाती है ,जबकि पृथ्वी और ग्रहों से उत्पन्न ऊर्जा या शक्ति प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में रिनात्मक होती है ,,यह दोनों ही उर्जाये हमारे लिए सकारात्मक ही होती हैं ,इन दोनों के संतुलन और प्राप्ति से ही समस्त प्राणी और जीव -वनस्पतियों की उत्पत्ति और स्थिति होती है ,,,इन प्राकृतिक शक्तियों के अतिरिक्त दो अन्य पारलौकिक शक्तिया व्यक्तियों को प्रभावित करती है ,सकारात्मक और नकारात्मक ,,सकारात्मक वह है जिनकी शक्ति आपके लिए लाभदायक है जैसे आपके ईष्ट ,आपके कुल देवता ,महाविद्यायें,देवी-देवता आदि और नकारात्मक वह है जो आपके लिए समस्या ही उत्पन्न करते है जैसे भूत-प्रेत-पिशाच-ब्रह्म राक्षस-जिन्न-शाकिनी-डाकिनी आदि ,
आज के समय में नकारात्मक ऊर्जा शक्तियों का प्रभाव सामान्यतया घरों परिवारों पर बहुत दिखने लगा है ,जबकि उन्हें पता ही नहीं होता की वे इनसे प्रभावित है ,उनके द्वारा बताये जाने वालो लक्षणों से प्रथम दृष्टया अकसर इनकी समस्या घरों में मिलती है ,इनके कारण वास्तु दोष ,घरों में सूर्य के प्रकाश की कमी ,गलत जगह गलत हिस्सों का बना होना ,पित्र दोष ,कुल देवता का दोष ,ईष्ट प्रबलता की कमी ,रहन-सहन की स्थिति ,विजातीयता ,धार्मिक श्रद्धा की कमी ,खुद की गलतियाँ ,प्रतिद्वंदिता ,अभिचार आदि हो सकते हैं ,
यदि घर से बाहर से घर पहुचने पर सर भारी हो जाए ,घर में अशांति का वातावरण हो ,कलह होता हो,पति-पत्नी में अनावश्यक अत्यधिक कलह हो ,पूजा-पाठ में मन न लगे ,पूजा पाठ से सदैव मन भागे ,पूजा पाठ करते समय सर भारी हो,लगे कोई आसपास है ,जम्हाई अधिक आये ,पूजा पाठ करने से दुर्घटनाएं या परेशानियां बढ़ जाएँ ,पूजा पाठ आदि धार्मिक क्रियाओं में अवरोध उत्पन्न हो ,बीमारियाँ अधिक होती हों ,आय-व्यय का संतुलन बिगड़ा हो ,आकस्मिक दुर्घटनाएं अधिक होती हों ,रोग हो किन्तु कारण पता न चले ,सदस्यों में मतभेद रहते हों ,मन हमेशा अशांत रहता हो ,खुशहाली न दिखे ,प्रगति रुकी लगे अथवा अवनति होने लगे ,संताने विरुद्ध जाने लगें ,संतान बिगड़ने लगे ,उनके भविष्य असुरक्षित होने लगे ,संतान हीनता की स्थिति हो ,अधिक त्वचा रोग आदि हों ,अपने ही घर में भय लगे ,लगे कोई और है आसपास ,अपशकुन हो ,अनावश्यक आग आदि लगे ,मांगलिक कार्यों में अवरोध उत्पन्न हो तो समझना चाहिए की घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश है, इस स्थिति में इनका पता लगाने का प्रयास करके इन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए |
जब आपके कुल देवता /देवी को ठीक से पूजा न मिले तो वे नाराज हो सकते हैं अथवा निर्लिप्त हो सकते हैं ,कमजोर भी हो सकते हैं ,ऐसे में नकारात्मक ऊर्जा को रोकने वाली मुख्य शक्ति हट जाती है और वह परिवार पर प्रभावी हो सकती है,कभी कभी कुलदेवता की नाराजगी या निर्लिप्तता से या नकारात्मक ऊर्जा अधिक प्रबल होने से वह कुलदेवता या ईष्ट को दी जाने वाली पूजा खुद लेने लगती है जिससे उसकी शक्ति बढने लगती है और कुलदेवता/देवी कमजोर या रुष्ट होते जाते हैं और ईष्ट को भी पूजा नहीं मिलती है ,आपके ईष्ट कमजोर हों या कोई ईष्ट ही न हों या आप पूजा पाठ ठीक से न करते हों तो भी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव घर में हो सकता है ,,किसी से दुश्मनी हो तो वह भी आभिचारिक क्रिया करके किसी नकारात्मक ऊर्जा को आप पर भेज सकता है ,,आपके घर में पित्र दोष है तो पितरों के साथ अन्य शक्तियां भी जुड़ जाती हैं जिन्हें आपके परिवार से कोई लगाव नहीं होता है ,पित्र भले नुक्सान कभी कभी न करें किन्तु साथ जुडी शक्तिया अवश्य अपनी अतृप्त इच्छाएं आपके परिवार या आप से पूर्ण करने का प्रयास करती हैं ,,ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष तो लगता है की ४ लोग घर में हैं किन्तु खर्च १० लोगों के बराबर होता है और कोई न कोई समस्या उत्पन्न होती ही रहती है ,कभी कभी कोई नकारात्मक शक्ति किसी पर आधिपत्य करके अपने को देवी या देवता बताती है और पूजा प्राप्त करने लगती है जिससे उसकी शक्ति तो बढती ही है उसके निकाले जाने की भी संभावना कम हो जाती है ,,घर में अन्धेरा हो तो भी नकारात्मक शक्तिया घर में स्थान बना लेती हैं क्योकि ऐसी जगहों पर उन्हें अच्छा लगता है रहना ,फलतः वे वहां रहने वालों के लिए समस्या उत्पन्न करते हैं ,,कभी कभी कोई नकारात्मक ऊर्जा आशक्तिवश भी किसी के पीछे लग जाती है और उससे अपनी अतृप्त वासनाएं पूर्ण करने का प्रयास करती है ,,कभी कभी किसी जमीन में नकारात्मक उर्जाओं का स्रोत होता है और उस पर मकान बना लेने पर वह वहां रहने वालों को परेशान करती है ,,कभी कभी बहुत अधिक दुर्घटनाएं अथवा हत्याएं भी किसी घर को इनका डेरा बना देते हैं ,
यदि व्यक्ति को लगे की उसके घर में या उस पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव है तो उसे किसी योग्य जानकार व्यक्ति ,सिद्ध व्यक्ति या उच्च स्तर के तांत्रिक से मिलना चाहिए ,,इनसे मुक्ति का उपाय करना चाहिए ,पित्र दोष ,कुल देवत/देवी दोष ,ईष्ट दोष ,गृह दोष का उपचार करना चाहिए ..

9….वायव्य बाधा [भूत-प्रेत-ब्रह्म की समस्या ] तो नहीं
सामान्यतया त्वचा रोग संक्रमण ,ग्रह स्थितियों आदि के कारण होते है ,जब ग्रहों की दशा-अंतर्दशा रोग कारक ग्रहों की आती है तब यह रोग हो सकते है ,अथवा संक्रमण से भी यह होते है ,कारण और भी हो सकते है |शायद इससे बहुत से लोग असहमत होगे की ये रोग वायव्य बाधाओं यथा ब्रह्मराक्षस ,प्रेत आदि के प्रकोप से अथवा तांत्रिक अभिचारो के कारण भी हो सकते है |बहुत से लोग इन वायव्य बाधाओं और तांत्रिक अभिचारो का अस्तित्वा से ही असहमत होगे |किन्तु कभी -कभी त्वचा रोग इनके कारण भी उत्पन्न हो सकते है ,तांत्रिक उपचारों द्वारा इनका ठीक होना भी पाया गया है|
ऐसा माना जाता है की वायाव्य् बाधा [ब्रह्म राक्षस ]के कारण श्वेत कुष्ठ और जली हुई त्वचा जैसा रोग उत्पन्न होता है ,त्वचा पर अपने आप फफोले पड़ना ,जलन ,सिकुडन ,चकत्ते ,घाव आदि होना इसके कारण हो सकते है |इनके साथ सर भारी होना ,दृष्टि वक्र होना ,दौरे जैसे लक्षण ,शारीर गर्म रहना ,शारीर से तीब्र दुर्गन्ध आदि भी उत्पन्न हो सकते है |चेचक जैसे त्वचा रोग को सदियों से दैवी या माता का प्रकोप माना जाता रहा है और पैसा उतारना तथा घरेलु उपचारों से ठीक होते भी देखा गया है |
.ऐसे में त्वचा रोग होने पर ज्योतिषीय योगो के अध्ययन के बाद ,इसे भी दृष्टि में रखा जाए तो सफलता शीघ्र मिलाने की उम्मीद की जा सकती है ,,,,ज्योतिष योग न हो और समस्या हो तो उपाय कारगर हो सकते है |ऐसी समस्या लगने पर बगलामुखी यंत्र धारण करना ,पूजा करना ,बागला प्रत्यंगिरा कवच का पाठ लाभकारी हो सकता है ,,,भैरव उपासना ,महामृत्युंजय जप ,गणपति उपासना भी लाभकारी हो सकती है ,,,,यद्यपि यह सारे उपाय जानकार व्यक्ति अपने ज्ञान और क्षमता के अनुसार करता है या बताता है ,,इस हेतु भिन्न व्यक्ति भिन्न तरीके अपनाते है ,,किन्तु इन उपायों से लाभ होते पाया जाता है यदि बाधा है ..

10….टोने-टोटके भी प्रारब्ध बदल सकते हैं
लोग कहते हैं की टोन-टोटकों से कुछ नहीं होता ,जो होना है वह होकर रहेगा |जो भाग्य में लिखा है ,जो पूर्व कर्मो के अनुसार प्रारब्ध बना है वह होगा ही चाहे कुछ भी किया जाए |यह गलत धरना है ,यह पूर्ण भाग्यवादियों की भाषा है |ऐसी विचारधाराओं के लोग अच्छा होने पर खुद को श्रेय और गलत होने पर भाग्य को श्रेय देते रहते हैं |हम सभी प्रकृति के अंग हैं ,यहाँ प्रत्येक क्रिया की एक निश्चित प्रतिक्रिया होती है |जिस प्रकार पूर्वकृत कर्मो की प्रतिक्रिया स्वरुप आज का प्रारब्ध बना है ,उसी प्रकार कुछ क्रियाएं यदि विपरीत दिशा में की जाए जो तात्कालिक प्रभाव रखती हों तो इन प्रारब्धों में भी कमी की जा सकती है अथवा प्रारब्ध की दिशा में क्रिया करके उसकी गति बढ़ा दी जाए तो प्रारब्धों की भी गति और समय बढ़ सकता है |प्रारब्ध जानने की कई विधिया जैसे ज्योतिष आदि प्रचलित है |इनके अनुसार किये गए टोन टोटके इनको प्रभावित करते हैं |टोना किसी भी अनुष्ठानिक और विधिपूर्वक की गयी क्रिया को कहते हैं ,जिनमे सामान्यतया प्रकृति की उच्च स्तर की शक्तियों का सहयोग लिया जाता है जबकि टोटका छोटे सामान्य उपाय हैं जो समय समय पर किये जाते हैं |
यह समस्त ब्रह्माण्ड एक शक्ति से संचालित है |ब्रह्माण्ड की शक्ति से ही ग्रहों पर प्रकृति की शक्ति नियंत्रण करती है |प्रकृति [ब्रह्माण्ड] की शक्ति प्रत्येक कण ,जीव ,वनस्पति ,जल ,वायु में व्याप्त है |यही शक्ति या उर्जा इन टोन -टोटकों में भी कार्य करती है |मानसिक शक्ति की उर्जा ,वस्तु की ऊर्जा ,विशेष गृह स्थितियों से उत्पन्न विशेष उर्जा ,वातावरणीय शक्तियों की उर्जा ,ध्वनि की ऊर्जा आदि का ही संयोजन इन टोन-टोटकों में भी होता है ,जिसे एकीकृत करके लक्ष्य पर प्रक्षेपित किया जाता है |
प्रत्येक जीव ,वनस्पति के शरीर में प्रकृति की उर्जा संरचना के अनुरूप ही उर्जा परिपथ निर्मित होता है |मनुष्य का शरीर इस ऊर्जा परिपथ से ही संचालित होता है |इसका उर्जा चक्र निर्धारित और निश्चित है |यह प्रकृति की देंन है |इसी उर्जा चक्र के अनुसार ही उसे सभी कर्म करने होते है |उर्जा चक्र की इस व्यवस्था में संघर्षशील कर्म द्वारा या तकनिकी द्वारा उर्जा व्यवस्था में परिवर्तन किया जा सकता है |क्योकि यह भी प्रकृति की एक ऊर्जा व्यवस्था ही है ,और इसमें अगर दूसरी ऊर्जा को प्रक्षेपित कर दिया जाए तो इस व्यवस्था में परिवर्तन हो सकता है |जब उर्जा चक्र में परिवर्तन होगा तो प्रारब्ध भी प्रभावित होगा ही ,क्योकि यह भी ऊर्जा व्यवस्था से ही संचालित होता है |
निश्चित समय ,स्थान ,दिशा ,सामग्री ,देवता ,भाव ,उद्देश्य के साथ प्रबल मानसिक शक्ति से जब कोई क्रिया की जाती है तो उससे एक विशिष्ट और अति तीब्र उर्जा या शक्ति उत्पन्न होती है ,जिसमे उपरोक्त सभी की शक्तियों का संग्रह होता है ,,इसे जब किसी लक्ष्य पर प्रक्षेपित किया जाता है तो यह उस लक्ष्य के उर्जा परिपथ को प्रभावित करता है और उससे जुड़ जाता है |इसकी प्रकृति सकारात्मक है तो यह सम्बंधित परिपथ को सबल बना उसे नई गति और ऊर्जा दे देता है ,और अगर नकारात्मक है तो उः उस परिपथ को बाधित-रुग्न कर देता है }परिणाम स्वरुप सम्बंधित व्यक्ति के कर्म-सोच-क्षमता-विचार-व्यवहार-शारीरिक स्थिति प्रभावित हो जाती है |इसके फल स्वरुप उपयुक्त अथवा अनुपयुक्त कर्मो के अनुसार कल मिलने वाले परिणाम आज मिल सकते है अथवा नहीं मिल सकते हैं |मिलने वाले परिणामो की मात्र भी प्रभावित हो जाती है |
टोन-टोटके में भी वाही उर्जा विज्ञान काम करता है जो प्रकृति का उर्जा विज्ञान है |क्योकि जीव धारियों-वनस्पतियों में भी वाही ऊर्जा विज्ञान कार्यरत है अतः इन टोन-टोटकों से वह प्रभावित हो जाते हैं |टोन टोटकों से उत्पन्न ऊर्जा लक्ष्य को प्रभावित कर वहां की प्रकृति बदल देती है |वाहन चला रहे एक व्यक्ति द्वारा किसी निर्णय में एक सेकेण्ड का विलम्ब उसे मौत के मुह में पंहुचा सकता है |किसी व्यवसायी द्वारा लिया गया एक सही निर्णय लाखों-करोड़ों का लाभ दे सकता है |किसी के मुह से निकला एक गलत शब्द उसकी नौकरी ले भी सकता है और नौकरी दिला भी सकता है |यह सब ऊर्जा प्रणाली से उत्पन्न मानसिक स्थिति के उदाहरण मात्र हैं |
टोन-टोटकों का उपयोग अच्छे और बुरे दोनों रूपों में होता है |इन सब के पीछे प्रकृति अर्थात तंत्र का ऊर्जा विज्ञान होता है |टोना अर्थात पूजा-अनुष्ठान-साधना में तो बड़ी ऊर्जा शक्तियां कार्य करती हैं जो भाग्य में भी परिवर्तन कर सकती है |किन्तु टोटकों में भी प्रकृति के आसान किन्तु प्रभावी विकल्पों का ही चयन किया जाता है ,जो क्षण-प्रतिक्षण की क्रिया को प्रभावित करती हैं |चुकी यह उर्जा विज्ञान है और हर जगह ऊर्जा विज्ञान ही कार्य करता है अतः परिवर्तन होता है |यदि ऐसा न होता तो चिकित्सा,औसधी,उपाय ,उपचार का कोई महत्व ही नहीं होता और यह प्रकृति में किसी के मष्तिष्क से उत्पन्न ही नहीं होते और इनकी अवधारणा ही विक्सित न होती |क्योकि जब सब कुछ निश्चित ही होता तो सब खुद नियत चलता ,प्रकृति ऐसी उर्जा उत्पन्न ही न होने देती जिससे इनकी अवधारणा विक्सित हो सके ,,ऋषि-महर्षियों-देवताओं द्वारा इसीलिए पूजा-उपचार-उपाय-तंत्र का विकास किया गया क्योकि प्रकृति में उर्जा विज्ञान ही कार्यरत है और इसमें ऊर्जा द्वारा ही परिवर्तन संभव है |.

11….विद्या लाभ तथा स्मरणशक्ति के लिए
[१] जो विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर हों ,हमेशा असफल होता हो तो सियार के बाल को चांदी या सोने की ताबीज में धारण कराने से लाभ होता है |
[2] यदि कोई विद्यार्थी मंगलवार व् शनिवार को सुन्दरकाण्ड का पाठ व् शिव की पूजा करता है तो वह विद्यावान बनता है |
[३] प्रत्येक रविवार सुर्यपूजन व् बिना नमक का भोजन कर लाल वस्तु का दान करने से सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है |
[४] बच्चे की स्मरणशक्ति बढाने के लिए शनिवार से शनिवार तक नित्य रात्री बारह बजे उसकी शिखा मूल के दो या चार केश काटकर एकत्र कर लें ,,फिर रविवार को इन सबको एकत्र करके दरवाजे की चौखट पर जलाकर पैर की एड़ी से मसल दें |
[५] शुक्रवार को रात्री में कौवे के सात पंखों को धोकर श्वत धागे से बांधकर रखें |फिर दुसरे दिन रात्रि में उन पंखों को धुप दीप दिखाकर धागा हटा दें |हटाये हुए धागे को दायें हाथ में धारण करें तथा पंखों को अपने पास रखें तो स्मरण शक्ति बढती है
[६] शनिवार को कौवे की पीठ के सात पंखों को दिन में धोकर सुखा लें तथा रात्री में धुप-दीप दिखाकर सिरहाने के नीचे रख दें |दुसरे दिन पंखों का चूरा बनाकर किसी भी रंगीन कागज़ में पुडिया बनाकर ताम्र या रजत यन्त्र में डालकर धारण करने से से स्मरण शक्ति बढती है |धारण करने के बाद यन्त्र को उतारें नहीं विद्या बुद्धि एवं सफलता प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष धारण

विद्या,ज्ञान व बुद्धि की प्राप्ति के लिए तीन मुखी व छ: मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इसे धारण करने से तीब्र बुद्धि होती है व अद्भुत स्मरण शक्ति प्राप्त होती है, जो पढाई में कमजोर हों वे इसे अवश्य धारण करें,बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा, तीन मुखी या छ: मुखी रुद्राक्ष धारण, करने से रचनात्मक कार्यों में भी बहुत लाभ मिलता है, जैसे यदि आप फैशन डिजाइनर हो, सौन्दर्य जगत से जुड़े हो, लेखक या सम्पादक हों, चित्रकार या अनुसंधानकर्ता हों तो ये रुद्राक्ष आपको बहुत लाभ प्रदान करेंगे,|……

ہفتہ، 28 اکتوبر، 2023

सर्वकामनासिद्धि स्तोत्रम्

सर्वकामनासिद्धि स्तोत्रम्

श्री हिरण्यमयी हस्तिवाहिनी, संपत्तिशक्तिदायिनी ।

मोक्षमुक्तिप्रदायिनी सद्बुद्धिशक्तिदात्रिणी || १॥ सन्ततिसम्वृद्धिदायिनी शुभशिष्यवृन्दप्रदायिनी | नवरत्ना नारायणी भगवती भद्रकारिणी || २ || धर्मन्यायनीतिदा विद्याकलाकौशल्यदा | प्रेमभक्तिवरसेवाप्रदा राजद्वारयशविजयदा || ३

धनद्रव्य अन्नवस्त्रदा प्रकृति पद्मा कीर्तिदा | सुखभोगवैभवशान्तिदा साहित्यसौरभदायिका ॥ ४ ॥

वंशवेलिवृद्धिका कुलकुटुम्बापौरुषप्रचारिका

स्वज्ञातिप्रतिष्ठाप्रसारिका
स्वजातिप्रसिद्धिप्राप्तिका || ५ ||

भव्य भाग्योदयकारिका रम्यदेशोदयउद्भाषिका |

सर्वकार्यसिद्धिकारिका भूतप्रेतबाधावाशिका ||अनाथ अधमोमोद्धारिका पतितपावनकारिका |

मनवाञ्छितफलदायिका सर्वनरनारीमोहनेच्छापूर्णिका || ७ || साधनज्ञानसंरक्षिका मुमुक्षुभावसमर्थिका । जिज्ञासुजनज्योतिर्धरा सुपात्रमानसम्वर्द्धिका || ८ ॥ अक्षरज्ञानसङ्गतिका स्वात्मज्ञानसन्तुष्टिका | पुरुषार्थप्रताप अर्पिता पराक्रमप्रभावसमर्पिता ||

९॥ स्वावलम्बनवृत्तिवृद्धिका स्वाश्रयप्रवृत्तिपुष्टिका | प्रतिस्पर्द्धशत्रुनाशिका सर्वऐक्यमार्गप्रकाशिका || 30 ||

जाज्वल्यजीवनज्योतिदा षड्रिपुदलसंहारिका | भवसिन्धुभयविदारिका संसारनाव सुकानिका ||

११||

चौरनामस्थानदर्शिका रोग औषाधीप्रदर्शिका | इच्छितवस्तुप्राप्तिका उरअभिलाषापूर्णिका || १२

|| श्री देवी मङ्गला गुरुदेवशापनिर्मूलिका | आद्यशक्ति इन्दिरा ऋद्धिसिद्धिदा रमा || १३ || सिन्धुसुता विष्णुप्रिया पूर्वजन्मपापविमोचना | दुःखदैन्यविध्नविमोचना नवग्रहदोषनिवारणा |ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीसर्वकामनासिद्धि महायन्त्रदेवतास्वरुपिणी श्रीमहामाया महादेवी महाशक्ति महालक्ष्म्यै नमो नमः । ॐ ह्रीं श्रीपरब्रह्म परमेश्वरी । भाग्यविधाता भाग्योदय कर्त्ता भाग्यलेखा भगवती भाग्येश्वरी ॐ ह्रीं । कुतूहलदर्शक, पूर्वजन्मदर्शक, भूतवर्तमान भविष्यदर्शक, पुनर्जन्मदर्शक, त्रिकालज्ञानप्रदर्शक, दैवीज्योतिष महाविद्याभाषिणी त्रिपुरेश्वरी | अद्भुत, अपूर्व, अलौकिक, अनुपम, अद्वितिय, सामुद्रिकविज्ञान रहस्यरागिनी, श्रीसिद्धिदायिनी | सर्वोपरिसर्वकौतुकानि दर्शय दर्शय, हृदयेच्छित सर्वइच्छा पूरयपूरय, ॐ स्वाहा ॐ नमो नारायणी नवदुर्गेश्वरी | कमला, कमलशायिनी, कर्णस्वरदायिनी, कर्णेश्वरी, अगम्य अदृश्य अगोचर अकल्प्य अमोघ अधारे, सत्यवादिनी, आकर्षणमुखी, अवनी आकर्षिणी,

मोहनमुखी, महिमोहिनी, वश्यमुखी, विश्ववशीकरणी, राजमुखी, जगजादुगरणी, सर्वनरनारीमोहनवश्यकारिणी, मम करणे अवतरअवतर, नग्नसत्य कथय कथय | अतीत अनाम वर्तनम् | मातृ मम नयने दर्शन | ॐ नमो श्रीकरणेश्वरी देवी सुरा शक्तिदायिनी | मम सर्वेप्सित सर्वकार्यसिद्धि कुरु कुरु स्वाहा |

ॐ श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीमहामाया महाशक्ति महालक्ष्मी महादेव्यै विच्चेविच्चे श्रीमहादेवी महालक्ष्मी महामाया महाशक्त्यै क्लीं ह्रीं ऐं श्रींS

ॐ श्री पारिजातपुष्पगुच्छधारिण्यै नमः | ॐ श्री ऐरावतहस्तिवाहिन्यै नमः |

ॐ श्री कल्पवृक्षफलभक्षिण्यै नमः |

ॐ ॐ श्रीकामदुर्गा पयःपानकारिण्यै नमः |

ॐ श्री नन्दनवनविलासिन्यै नमः |

ॐ श्री सुरगंगाजलविहारिण्यै नमः | ॐ श्री मन्दारसुमनहारशोभिन्यै नमः |

ॐ श्री देवराजहंसलालिन्यै नमः |

ॐ श्री अष्टदलकमलयन्त्ररूपिण्यै नमः | ॐ श्री वसंतविहारिण्यै नमः |

ॐ श्री सुमनसरोजनिवासिन्यै नमः |

ॐ श्री कुसुमकुञ्ज भोगिन्यै नमः |

ॐ श्री पुष्पपुञ्जवासिन्यै नमः | ॐ श्री रतिरूपवरगंजनायै नमः |

ॐ श्री त्रिलोकपालिन्यै नमः |

ॐ श्री स्वर्गमृत्युपातालभुमिराजकर्यै नमः |ॐ श्री लक्ष्मीयन्त्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीशक्तियंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीदेवीयन्त्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीरसेश्वरीयंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीऋद्धियंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीसिद्धियंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीकीर्तिदायंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीप्रीतिदायंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीइन्दिरायंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीकमलायंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीहिरण्यवर्णयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीरत्नगर्भायंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीसुवर्णयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीसुप्रभायंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीपङ्कनीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीराधिकायंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीपद्मयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीरमायंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीलज्जायंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीजयायंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीपोषिणीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीसरोजिनीयंत्रेभ्यो नमः |ॐ श्रीहस्तिवाहिनीयंत्रेभ्यो नमः ।

ॐ श्रीगरुड़वाहिनीयंत्रेभ्यो नमः

ॐ श्रीसिंहासनयंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीकमलासनयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीरुष्टिणीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीपुष्टिणीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्री तुष्टिनीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीवृद्धिनीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीपालिनीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीपोषिणीयंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीरक्षिणीयंत्रेभ्यो नमः |

ॐ श्रीवैष्णवीयंत्रेभ्यो नमः |

श्री मानवेष्टाभ्यो नमः | श्री सुरेराष्टाभ्यो नमः |

श्रीकुबेराष्टाभ्यो नमः |

श्रीत्रिलोकाष्टाभ्यो नमः | श्रीमोक्षयंत्रेभ्यो नमः |

श्रीभुक्तियंत्रेभ्यो नमः |

श्रीकल्याणयंत्रेभ्यो नमः |

श्रीनवार्णयंत्रेभ्यो नमः |

श्री अक्षस्थानयंत्रेभ्यो नमः |

श्रीसरस्थानयंत्रेभ्यो नमः |

श्रीप्रज्ञावतीयंत्रेभ्यो नमः |

श्रीपद्मावतीयंत्रेभ्यो नमः |श्रीशङ्खचक्रगदापद्मधरायंत्रेभ्यो नमः | श्रीमहालक्ष्मीयंत्रेभ्यो नमः | श्री लक्ष्मीनारायणयंत्रेभ्यो नमः | ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीमहामायादेवी महाशक्ति महालक्ष्मीस्वरूपा श्री सर्वकामनासिद्धि महायन्त्रदेवताभ्यो नमः | ॐ विष्णुपत्नीं क्षमादेवीं माध्वीं च माधव प्रिया | लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् || ॐ महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नि च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ||

मम सर्वकार्यसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ||

|| सर्वकामना सिद्धि स्तोत्र संपूर्ण ||

विधी---अथ सर्वकामनासिद्धि स्तोत्रम्


इस प्रयोग से सर्वारिष्ट दूर होकर मङ्गल कार्य सिद्ध होते हैं ।


शुभाशुभ प्रश्न का उत्तर, भूत भविष्य का ज्ञान भी प्राप्त होता है । अष्टदल कमल में देवी का आवाहन करें । नित्य प्रति ११ पाठ कर धुत्रय से होम करें |

جمعرات، 12 اکتوبر، 2023

गणेश कूंची


श्री नाथ जी के भण्डार में प्रयुक्त किये जाने वाले मंत्र

गणेश कूंची

सत नमो आदेश गुरु जी को आदेश ! आदेश! ॐ गुरु जी! गणेश आया ऋद्धि सिद्धि लाया। ऋद्धि सिद्धि का भरे भण्डार ।। देह कूंची हिंगलाज की ज्ञान कूंची ग्रहों की कंठ कूची गोरक्षनाथ जी की ।। लागी कूंची खुले कपाट अब देखो ब्रह्माण्ड का ठाठ, अक्षय नाथ जी का भरे भण्डार ।। अनन्त अनन्त कोटि सिद्धों में खीर खाण्ड का होवे प्रवान।। लावो भण्डार धरो ध्यान, आगच्छ आगच्छ श्री नाथ जी गुरु जी आदेश! आदेश!

श्री गणेश कूंची मंत्र

ॐ गुरु जी! गणेश आया. ऋद्धि सिद्धि लाया। ऋद्धि सिद्धि का भरो भंडार ।। पीर पैगम्बर औलिया आदेश उतारा शिखर कोट के उपर आप विराजो दर्शन दीजी माँ हिंगलाज 1 अनभे कूंची अनमे ध्यान, लागी कूंची खुला कपाट दुखीया भरे मूंज का ठाठ ।। जपता जाप कटता पाप, अलष निरंजन आपो आप गणेश कूंची मंत्र सम्पूर्ण भया । गादी बैठकर गुरु गोरक्षनाथ जी ने कहा सिद्धो गुरुवरो योगेश्वरो आदेश! आदेश!

कुबेर भण्डार गायत्री

सत नमो आदेश गुरु जी को आदेश ! आदेश! ॐ गुरु जी ! ॐ सोहं आकाश डिब्बी पाताल का ठीया धर्ती का चूल्हा करूं, आकाश का ठीया ।। T नवनाथ चौरासी सिद्धों ने बैठकर भण्डार का मता किया।। चढ़े डिब्बी उतरे ऋद्धि-सिद्धि काली पीली शिर जटा भाई पार्वती का उपदेश, शिव मुख जाये।

हाथ खड़ग तत की माला, जाप जपे श्री सुरिया बाला । ऋद्धि पूरे माई अन्न पूर्णा, घृत पूरे गणेश अलील पूरे ब्रह्मा, माया पूरे महाकाली। हीरा पूरे हिंगलाज नवखण्ड में जोत जगाई।

ऋद्धि लावो भण्डारी नाई। ऋद्धि खुटे सदाशिव की जटा टूटे ।। ऋद्धि खूटे, माता सीता सतवन्ती का सत्य छूटे

ऋद्धि खूटे माता पार्वती का कंगन टूटे। ऋद्धि खुटे मान थान का मान टूटे ।। चन्द सूर्य दो भरें साखी इतना कुबेर गायत्री जाप सम्पूर्ण भया । श्री नाथ जी गुरु जी आदेश! आदेश!

सूर्य मंत्र

सूर्य मंत्र

ॐ सत नमो आदेश गुरु जी को आदेश ! आदेश! ॐ गुरु जी ! ॐ ऊगंत सूर, बाजंत तूर. बरसंत सूर काल कण्टक जाहि दूर । हाथ खंग गले पुष्प माला, नौ खण्ड पृथ्वी भया उज्याला । त्रिकाल देवता सूरज स्वरूपी, प्रभाते ब्रह्म स्वरूपी मध्याहे विष्णु स्वरूपी, सन्ध्याहे शिव स्वरूपी, एता सूर्य जाप जपन्ते, अष्ट सिद्धिनव निधि फलंते। ऊँकार, जै जै कार, सूर्य देवता को नमस्कार ।लक्ष्मण कुंडली

सिद्धो! देखो कलू काल की निशानी। अग्नि रूपी समोनारी, घृतरूप समो नरः । कथ्यते लक्ष्मण जतीः ।।

ॐ गुरु जी सत्त हीन पृथ्वी, गगन हीन पानी, वेद हीन ब्रह्मा ज्ञान हीन योगी । माता जाकी लष्टम पस्टम, पिता वर्ण संकरा तासु पुत्र भये योगी धुन्धुपाधी तस्करा, मस्करा । माता जाकी सतवन्ती (सीलवन्ती) पिता सत सत भाषते । तासु पुत्र भये योगी, योगारम्भ को साधन्ते अष्टोत्तर कुल तारन्ते ।। पाप छोड़ पुण्य लगन्ते । कहो तो गुरु जी धरती पलटू कहो तो पलटू काया। कहो तो गुरु जी दीन पलटू कहो तो खँ माया ।। काहे को लक्ष्मण दीन पलटो, काहे को खींचो माया। आपो आप धुन्धु (द्वन्द मचेगा, हुकम गुरु का आया।।



दर्शनी तो कर्षनी होंगे, राजे होंगे हाली। जती सती कोई विरला होगा, हो जाएँगे सब घर बारी ।। पहरा आएगा शाह का, धरती मांगेगी भोग कितनों को षड्ग संहारसी कितनों को व्यापे रोग ।। पैसे पैसे में घोड़ा होगा, धेले धेले नारी। जती सती कोई बिरला रहेगा, और सब हो जायेंगे घर बारी।।

देवल देख के देव धसेगा, मस्जिद देख मुनारा जम्बू द्वीप में हलचल मचेगी कोई न होगा सिद्धो वर्जनहारा ।। तपस्वी तो हाट, मांगेगा, सुद्र तो एकादशी रखेंगे।

ब्राह्मण तो बाट मांगेंगे, गुरु चेले का प्रायश्चित लगेगा ।।

पुत्र न माने माई ना बाप । सात वर्ष की कन्या साधेगी घरबार ।। इन्द्र तो अलप बरसेंगे, संसार तो निष्फल फलेगा, नदी नालों का जल सूख जायेगा ।। गंगा यमुना सातवें पाताल में बहेगी, तब सिद्धो आया कलूकाल का वर्तमान ।

दिल्ली तख्त का झंडा झाड़ फाड़ कर बिछायेंगी, चौसठ योगिनी बैठकर मंगल गीत गावेंगी।।

श्वेत घोड़ा श्वेत पलाण, जिस पर बैठे अलष पुरुष निर्वाण पहले बैठी बामना, पीछे बैठी बीणजपुत्र जगत व्योवहार, जोगी कूड़ा कामनियाँ ।। हम तो सिद्धो तत्व निर्वाणी, अधर तत्त लौ लाई!

नित्त उठ अपनी काया को खोजो, आवागवन मिट जाई ।। सत् की सिद्धो सेली बांधलो, सब्द गुरु का वाचा, रण में झुंझे सो सूरमा जान । असंख जो जोगी रहे मलंगा, खड़ग कामिनी खेले संगा।। हंस हंस रखो काया गढ़ का राज, दृढ़कर राखो अपने पास। बज्र की लंगोटी बांधो कसकर पांच भूत आतमा करलो वश ।। लक्ष्मण जी कहे राम चन्द्र जी सुन लो !

कलयुग मध्ये वृत्तान्त सम्पूर्ण, लक्ष्मण कुंडली जाप सम्पूरण भया ।। टिल्ला शिवपुरी स्थान पर बैठकर सिद्ध बाल गुंदाई जी ने कथ पढ़कर सुनाया। श्री नाथ जी गुरु जी आदेश! ओदश !

منگل، 10 اکتوبر، 2023

Mooth Manter

मूठ मन्त्र


ॐ नमो वीर तो हनुमंत वीर सूर्य का तेज, शत्रु की काया । अदीठ चक्र देवी कालिका चलाया। चल रे बादी न कर। बाद में करि हों तेरे जीव का घात में न उरूं तेरे गुरु पीर सूं। मारूं ताने एक तीर सूं। मेरा मारा ऐसा घूमै । जैसा भुजंग की लहर परै तोहि गिरता मारूं बाण। फेरि चलो तो यही हनुमान की आन शब्द सांचा पिण्ड कांचा फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा

mooth


शनिवार की अर्द्धरात्रि में इस मन्त्र के जप का अनुष्ठान किया जाता है। साधक को श्मशान में जाकर अथवा किसी निर्जन स्थान पर बैठकर एकाग्र भाव से हनुमानजी का ध्यान लगाकर जप करना होता है। इसकी सिद्धि के लिये ९० दिनों तक प्रत्येक दिन १०८ मन्त्र का जप किया जाता है। मन्त्र सिद्ध हो जाने के पश्चात् शनिवार को दाहिने हाथ में उड़द लेकर उपरोक्त मन्त्र से २१ बार अभिमन्त्रित करके दुश्मन के ऊपर मारने से वह पछाड़ खाकर गिर जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। इसका प्रयोग वर्जित है।